हनुमानजी को न सिर्फ अजर और अमर माना जाता है, बल्कि यह भी मान्‍यता है कि जो भक्‍त प्रत्‍येक शनिवार को हनुमानजी की पूजा करते हैं, शनि उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। ऐसा क्‍यों होता है इसके पीछे भी एक कथा प्रचलित है। हनुमानजी रघुकुल के कुमारों को अक्‍सर कथा सुनाया करते थे रहे थे। इसी क्रम में वह एक बार शनि के बारे में राजकुमारों को बताने लगे।

उन्‍होंने बताया, ‘एक बार मैं अपने प्रभु श्रीराम का स्‍मरण कर रहा था तो उसी वक्‍त शनिदेव वहां पधारे और मुझे कहने लगे कि मैं आपको सावधान करने आया हूं। भगवान राम के त्रेता युग की बात दूसरी थी, अब कलियुग का आरंभ हो गया है। भगवान वासुदेव ने जिस क्षण पृथ्‍वी से अपनी लीला का समापन किया था, उसी क्षण से कलियुग शुरू हो गया था। अब इस युग में आपका शरीर दुबर्ल और मेरा बलवान हो गया है। अब से आप पर मेरी साढ़ेसाती की दशा प्रभावी हो गई है, और मैं अब आपके शरीर पर आ रहा हूं।’
शनिदेव को इस वक्‍त का तनिक भी अहसास नहीं था, जो हनुमान रघुवीर के परम भक्‍त थे, उन पर किसी दशा का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। यहां तक कि शनिदेव के अग्रज यमराज भी श्रीराम के भक्‍तों की ओर देखने का साहस एकाएक नहीं जुटा पाते। हनुमानजी ने शनि से कहा, आप मुझे अपने आराध्‍य का स्‍मरण करने दें और मेरे शरीर पर रघुनाथजी के अलावा कोई नहीं आ सकता है। मेरे शरीर और आत्‍मा दोनों में ही उनका वास है।
मगर शनि तब भी नहीं माने। कहने लगे, मैं सृष्टिकर्ता के विधान के आगे विवश हूं। पूरी सृष्टि पर मेरा प्रभुत्‍व है और आप भी मेरे प्रभुत्‍व क्षेत्र से बाहर नहीं हैं। अत: मैं आपके शरीर पर आ रहा हूं और आप मुझे रोक नहीं सकते। हनुमानजी ने कहा, मुझ वृद्ध को आप छोड़ दीजिए। लेकिन शनि कहां मानने वाले थे। कहने लगे, मैं सबसे ज्‍यादा मारक ग्रह हूं और मृत्‍यु के सबसे करीब तो वृद्ध ही होते हैं। तो मैं आपको कैसे छोड़ दूं।

शनिदेव नहीं माने और हनुमानजी के मस्‍तक पर आ बैठे। फिर हनुमानजी को सिर में खाज हुई। इसको मिटाने के लिए बजरंगबली ने पर्वत को सिर पर रख लिया। यह देखकर शनि ने घबराकर पूछा कि यह आप क्‍या कर रहे हैं। हनुमानजी बोले, मैं अपनी खाज मिटा रहा हूं। यह कहकर उन्‍होंने दूसरा पर्वत भी सिर पर रख लिया। इस पर शनिदेव ने कहा कि आप इसे उतारिए, मैं आपकी बात मानने को तैयार हूं। मगर हनुमानजी ने तीसरा पर्वत भी सिर पर रख लिया। अब शनि घबराकर बोले कि आपके शरीर पर तो दूर अब मैं आपके समीप भी नहीं आऊंगा। लेकिन हनुमानजी ने चौथा पत्‍थर भी सिर पर रख लिया। अब शनि को कुछ नहीं सूझ रहा था। वह हनुमानजी से बोले कि मैं अब उनको भी परेशान नहीं करूंगा जो आपका स्‍मरण करेंगे। बस आप मुझे उतर जाने दें। तभी से यह माना जाने लगा कि जो भी भक्‍त हनुमानजी का सच्‍चे मन से जप करते हैं, शनिदेव भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते