लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 11 अप्रैल को पश्चिम यूपी की आठ सीटों पर मतदान होना है. ये वे सीटें हैं, जहां 2014 में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था. जिन आठ सीटों पर मतदान होना है, उसमें सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर की लोकसभा सीटें शामिल हैं. इन सीटों पर कई दिग्गजों की किस्मत इस बार दांव पर है, जिसमें बीजेपी के संजीव बालियान, सत्यपाल सिंह, राजेंद्र अग्रवाल, डॉ महेश शर्मा, वीके सिंह, राघव लखनपाल, कुंवर भारतेन्द्र सिंह, रालोद के अजीत सिंह, जयंत चौधरी, कांग्रेस के इमरान मसूद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बसपा के हाजी याकूब, सपा के तबस्सुम हसन शामिल हैं.

इस बार बीजेपी का मुकाबला सपा-बसपा-रालोद गठबंधन और कांग्रेस से है. लिहाजा मोदी लहर में आसान जीत दर्ज करने वाले बीजेपी सांसदों की राह इस बार आसन नहीं है. अगर मुजफ्फरनगर सीट की बात करें तो इस सीट पर सीधा मुकाबला जाट बनाम जाट के बीच है. पिछले चुनाव में बागपत से हारने वाले अजीत सिंह इस बार गठबंधन के तहत मुजफ्फरनगर से चुनाव मैदान में हैं. उनके सामने मौजूदा सांसद संजीव बालियान हैं. पिछले चुनाव में संजीव बालियान को 6 लाख से ज्यादा मत हासिल हुए थे. मुजफ्फरनगर सीट पर जाट और मुसलमान मतदाता निर्णायक है. लिहाजा जाट वोटों में बिखराव की वजह से संजीव बालियान के सामने चुनौती बड़ी है. क्योंकि कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है, लिहाजा मुस्लिम वोट एकमुश्त गठबंधन को जाता दिख रहा है.
कैराना यूपी की हाई-प्रोफाइल सीटों में से एक है. इस सीट पर मुकाबला हसन घराना और हुकुम सिंह परिवार के बीच रहता रहा है. पिछले चुनाव में हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी. हालांकि उनकी मौत के बाद हुए उपचुनाव में रालोद की तबस्सुम हसन ने बीजेपी की मृगांका सिंह को हराया था. इस बार बीजेपी ने मृगांका को टिकट नहीं दिया है. उनकी जगह विधायक प्रदीप चौधरी को मैदान में उतारा है. जिसकी वजह से मृगांका सिंह के समर्थकों में रोष व्याप्त है. जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है. इस बार बीजेपी के सामने कांग्रेस के हरेंद्र मलिक और तबस्सुम हसन हैं.सहारनपुर सीट पर 2014 में राघव लखनपाल को देशभर में चल रही मोदी लहर का बड़ा फायदा मिला था. लखनपाल ने अपने प्रतिद्वंदी को 65 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी. यहां भारतीय जनता पार्टी का सीधा मुकाबला कांग्रेस के इमरान मसूद से था. इमरान मसूद 2014 में अपने बयानों के कारण काफी चर्चा में रहे थे. लेकिन इस बार यहां मुकाबला त्रिकोणीय है. बीजेपी के राघव लखनपाल, कांग्रेस के इमरान मसूद और गठबंधन की तरफ से हाजी फजलुर्रहमान मैदान में हैं. अगर मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ तो फायदा बीजेपी को मिल सकता है.
बिजनौर लोकसभा सीट पर एक बार फिर बीजेपी ने मौजूदा सासद कुंवर भारतेन्द्र सिंह को मैदान में उतारा है. उनके सामने कांग्रेस के नसीमुद्दीन सिद्दीकी और गठबंधन की तरफ से बसपा के मलूक नागर मैदान में हैं. इस सीट पर भी सीधा मुकाबला बीजेपी और गठबंधन के बीच है. मुस्लिम और गुर्जर बाहुल्य इस सीट पर फिलहाल बीजेपी का कब्जा है और यहां से कुंवर भारतेंद्र सिंह सांसद हैं. इस सीट पर करीब 35 फीसदी मुस्लिम और तीन लाख दलित और दो लाख जाट मतदाता हैं. ऐसे में गठबंधन अगर तीनों जातीय समीकरण को साधने में कामयाब रहते हैं तो बीजेपी के लिए वापसी कर पाना काफी मुश्किल होगा.
मेरठ सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है. एक बार फिर बीजेपी ने अपने दो बार से सांसद राजेंद्र अग्रवाल पर विश्वास जताया है, वैश्य और जाट बाहुल्य इस सीट पर कांग्रेस ने भी एक वैश्य उम्मीदवार को मैदान में उतारकर मुकाबला दिलचस्प बना दिया है. कांग्रेस ने यहां हरेंद्र अग्रवाल को मैदान में उतारा है. गठबंधन की तरफ से हाजी याकूब कुरैशी मैदान में हैं. अगर कांग्रेस बीजेपी के वोट को काटती है तो बसपा की यह सीट निकल सकती है.
बागपत यूपी के जाटलैंड माना जाता है. भारतीय जनता पार्टी की ओर से मौजूदा सांसद सत्यपाल सिंह चुनाव लड़ रहे हैं. जाटों के गढ़ बागपत की सीट आरएलडी के खाते में गई है, और यहां अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी मैदान में हैं. दरअसल गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के हिस्से गई है. वहीं कांग्रेस ने मुजफ्फरनगर से अजित सिंह और बागपत से जयंत सिंह के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है. बल्कि, कांग्रेस रालोद का समर्थन कर रही है. इसलिए इस सीट पर अब सीधा मुकाबला बीजेपी और गठबंधन के उम्मीदवार के बीच है. 2014 में चली मोदी लहर के दम पर भारतीय जनता पार्टी ने यहां परचम लहराया और मुंबई पुलिस के कमिश्नर रह चुके सत्यपाल सिंह सांसद चुने गए. जबकि अजित सिंह इस सीट पर तीसरे नंबर पर रहे थे. लेकिन इस बार बीजेपी की राह आसान नहीं है.
देश की राजधानी दिल्ली से सटी उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद लोकसभा सीट अभी बीजेपी के पास है. इस सीट पर दो ही बार लोकसभा चुनाव हुए हैं और दोनों ही बार ये सीट बीजेपी के खाते में गई है. गाजियाबाद लोकसभा सीट की गिनती प्रदेश की वीआईपी सीटों में होती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सेंटर के तौर पर भी गाजियाबाद सीट अहम मानी जाती है. पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह एक बार फिर से मैदान में हैं. उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस की डॉली शर्मा और गठबंधन की तरफ से सुरेश बंसल मैदान में हैं. यहां भी टक्कर गठबंधन और बीजेपी के बीच ही है. शहरी सीट होने के नाते यहां बीजेपी का पलड़ा भारी लग रहा है.
देश की राजधानी दिल्ली से सटी उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद लोकसभा सीट अभी बीजेपी के पास है. इस सीट पर दो ही बार लोकसभा चुनाव हुए हैं और दोनों ही बार ये सीट बीजेपी के खाते में गई है. गाजियाबाद लोकसभा सीट की गिनती प्रदेश की वीआईपी सीटों में होती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सेंटर के तौर पर भी गाजियाबाद सीट अहम मानी जाती है. पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह एक बार फिर से मैदान में हैं. उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस की डॉली शर्मा और गठबंधन की तरफ से सुरेश बंसल मैदान में हैं. यहां भी टक्कर गठबंधन और बीजेपी के बीच ही है. शहरी सीट होने के नाते यहां बीजेपी का पलड़ा भारी लग रहा है.