बाराबंकी। सिविल लाइन कर्बला बड़ेल में नजफ-इराक से आये आयतुल्लाह हसन रजा गदीरी और इमाम हुसैन रौजे के इंचार्ज आला जियाउद्दीन का शिया समुदाय के लोगों ने नारे तकबीर की सदाओं के बीच स्वागत किया। सज्जाद वेलफेयर सोसायटी के चेयरमैन सैय्यद मुजाहिद हुसैन नकवी के बड़े भाई स्व. सैय्यद यावर मेंहदी, सै0 मो0 मुस्लिम, फिदियतुज्जहरा, सै. मो. नकी, जाकिरतुज्जहरा, सै. मो. अकील, मो. तकी, सै. हैदर की मजलिस को खिताब करते हुए आयतुल्लाह हसन रजा गदीरी ने कहा कि अहलेबैत ही दीनी इस्लाम के सही रहबर हैं और जब भी इस्लाम पर मुसीबत पड़ी है तो अहलेबैत ने ही इस्लाम को मुसीबत से निजात दिलायी है। श्री गदीरी ने आगे कहा कि इस्लाम शांति अमन का पैगाम देता है। इस्लाम में कोई जोर जबरदस्ती नही की जा सकती है। आयतुल्लाह ने यह भी कहा कि इस्लाम को बचाने के लिये अहलेबैत के मानने वाले आगे आकर इस्लाम को बचाया। इमाम हुसैन का खानदान उसमें से एक है। जिन्होेने अपने दोस्त व खानदान वालों को कर्बला में इस्लाम के खातिर शहीद हुए तब जाकर इस्लाम सही मायने में मुसलमानों तक पहुंचा है। आयतुल्लाह ने आतंकवाद पर तंज कसते हुए कहा कि आतंकवाद की शुरुआत तो 1400 वर्ष पहले हो चुकी थी। आतंकवाद का कोई मजहब नही होता है। इस्लाम में तो यहां तक कहा गया है कि बेवजह पानी न बहाया जाये। लेकिन ये आतंकवाद इस्लाम के नाम पर इंसानो का खून पानी की तरह बहा रहे हैं। इसकी जितनी भी मजम्मत की जाये वह कम है। अन्त में आयतुल्लाह ने बीबी फातिमा जहरा के दर्दनाक मसायब बयान किये। जिसे सुनकर मोमनीन रोने लगे। मजलिस से पूर्व मौलाना यासुब अब्बास ने भी तकरीर की। मौलाना ने कहा कि ये हमारे लिये फक्र की बात है कि इराक से आये हुए आयतुल्लाह की जियारत शरफ हासिल हुई है। उन्होने यह भी कहा कि इराक स्थित मौला अब्बास के रौजे के खुद्दाम अमजद अल कलाबी अपने साथ मौला अब्बास रौजे का परचम भी साथ लाये हैं। जिसकी जियारत बाराबंकी की आवाम करेगी। मजलिस से पहले मौलाना मोहम्मद रजा जैदपुरी, असद नसीराबादी, अजमल किन्तूरी, कशिश सण्डीलवी, अदनान रिजवी, कलीम रिजवी, बाकर नकवी के अलावा कई शायरों ने अपने अपने कलाम पेश किये। मजलिस का सिलसिला देर रात तक चलता रहा। मजलिस के बाद चेयरमैन मुजाहिद हुसैन नकवी ने दूर दराज से आये मोमीनों का शुक्रिया अदा किया।