भक्ति संगीत में वैष्णव संतों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। निंबार्क संप्रदाय के महान संत स्वामी हरिदास को तो भक्ति संगीत का पितामह माना जाता है। अकबर के काल में तानसेन और बैजू बावरा के समकालीन एक और महान भक्ति संगीतकार हुए हैं जिन्हें बाबा रामदास बैरागी के नाम से जाना जाता है। रामदास बैरागी रामानंदी संप्रदाय के संत थे और भारतीय शास्त्रीय एवं भक्ति संगीत में उनका बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा। वह संगीत के बैरागी घराने के संस्थापक थे, जिसे रामदासी घराना भी कहा जाता है। बाबा राम दास बैरागी ग्वालियर के रहने वाले थे और अकबर तथा जहांगीर के दरबारी संगीतकार थे । अब्दुल रहीम खान-ए-खाना से भी उनके बहुत घनिष्ठ संबंध थे। इतिहासकारों के अनुसार यह तो निश्चित है कि कृष्ण भक्ति कवि और वल्लभाचार्य के शिष्य सूरदास जी के पिता का नाम रामदास था। लेकिन इस बारे में पक्की जानकारी नहीं है कि यह रामदास कौन थे। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ग्वालियर के यही संगीतकार राम दास बैरागी ही सूरदास के पिता थे। बाबा राम दास बैरागी सूरदास जी से उम्र में 26 वर्ष बड़े थे। इसलिए इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि सूरदास जी के पिता बाबा राम दास बैरागी ही हों।

राम दास बैरागी का गायन उनकी प्रतिभाशाली एवं गहरी आवाज के कारण प्रसिद्ध था। मियां तानसेन भी बाबा रामदास के प्रशंसक एवं विद्यार्थी रहे हैं । ऐसा माना जाता है कि मियां तानसेन बाबा राम दास की आवाज की गहराई से इतने ज्यादा प्रभावित थे कि बाद में उन्होंने भी गायन की इसी शैली को अपनाया। बाबा रामदास ऐसे संगीतज्ञ थे जिन्हें शास्त्रीय संगीत की गहरी जानकारी थी लेकिन उनका स्वभाव मियां तानसेन के बिल्कुल विपरीत था। उन्होंने संगीत को आलौकिक उपलब्धियां प्राप्त करने और आजीविका का साधन नहीं माना। बल्कि वह संगीत को आध्यात्मिक तुष्टीकरण का साधन मानते थे। यही कारण है कि तानसेन को कभी नायक की संज्ञा नहीं दी जाती। बाबा रामदास ने अनेक उच्च शास्त्रीय राग भी बनाए, जिनमें से कुछ हैं: रामदासी मल्हार, रामदासी सारंग, रामकली, रामा, रामकुशी, रामदास, रामकल्याण आदि।

उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र सूरदास ने भी इस परंपरा को जीवित रखा और उन्होंने भी बहुत से राग बनाए, जैसे कि सूरदासी मल्हार, सूरदासी तोड़ी, सूरदासी कल्याण। यह निश्चित नहीं है कि यह सूरदास, कृष्ण भक्ति के कवि और वल्लभाचार्य के शिष्य ही थे या कोई और। रामदासी घराने का गायन वाणिज्यिक रूप से प्रसिद्ध नहीं था। इस घराने के अनुसार संगीत का उद्देश्य वाणिज्यिक न होकर आध्यात्मिक था। इसी कारण यह घराना भारत में लगभग अज्ञात स्थिति में रहा। इस घराने में सिखाए जाने वाले संगीत में बहुत से ऐसे दुर्लभ राग और ताल हैं जिन्हें आज के समय में सामान्यत: नहीं सिखाया जाता है। संगीत के बैरागी घराने में आगे चलकर अनेक प्रसिद्ध संगीतकार हुए, जिनमें बाबा सूरदास, पंडित नारायण, जे. दामोदर, पंडित सीताराम, रमेश दास, भाई गोपाल सिंह, बाबा प्रभु दास, भाई गुरु प्रीत सिंह, उस्ताद आलम अली खान, पंडित आत्माराम, पंडित कुमार देसाई, उस्ताद सलीम खान आदि। संगीत के इस घराने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अधिकांश गायक संगीत शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञाता थे और दुर्लभ रागों और तालों की जानकारी रखते थे तथा संगीतज्ञ के रूप में प्रसिद्ध थे।

बैरागी घराने के संगीतकारों का सफर मनोरंजक अनुभवों के बजाय वास्तव में आध्यात्मिक अनुभव के साथ समय की यात्रा है। इसमें हर राग को उसके मूल रूप में ही गाया जाता है। इस घराने के संगीत में, तानों की तकनीकी, बाकी घरानों से अलग है। इस संगीत में प्रेम भाव के कारण तानों को 'दामिनी तान' कहा जाता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इस विशाल सागर में बैरागी घराने का संगीत लगभग विलुप्त हो गया है। वैसे तो बाबा राम दास बैरागी द्वारा बनाए गए सभी राग बहुत अच्छे हैं लेकिन उनके द्वारा बनाया गया 'राग मल्हार' अत्यंत मधुर राग है जो सम्राट अकबर को भी बेहद पसंद था। —डा. राज सिंह