दो साल पहले (19 अक्टूबर 2018) दशहरे वाले दिन, हुए जौड़ा फाटक रेल हादसे के पीड़ित परिवार सरकार और अफसरों की ढीली कार्यवाही के चलते आज भी नौकरी के इंतजार में बैठे हैं। अमृतसर जिला प्रशासन ने हादसे के साढ़े 14 महीने बाद तक इन्हें नौकरी देने का प्रोसेस ही शुरू नहीं किया। नाराज पीड़ित परिवारों ने जब 9 दिसंबर 2019 को भंडारी ब्रिज पर बेमियादी धरना लगाया और 11 दिन वहां बैठे रहे तो प्रशासन हरकत में आया।

उसके बाद मरने वाले 58 लोगों के 37 परिवार आइडेंटीफाई कर उनसे 30 दिसंबर 2019 तक डीसी दफ्तर की एमए ब्रांच-वन में आवेदन लिए गए। आवेदन लेने के बाद प्रशासन ने पटवारियों और फील्ड अफसरों से रिपोर्ट मांगी। 7 महीने और गुजर गए। जुलाई-2020 में प्रशासन ने 37 में से 17 परिवारों की फाइलें सीएम ऑफिस भेजीं।

12 अक्टूबर को बची 20 फाइलों में 17 भी सीएमओ भेज दिया गया। अब ये फाइलें सीएम ऑफिस में हैं। हादसे में 150 लोगों के घायल होने की बात कही गई मगर सरकारी आंकड़ों के अनुसार 71 लोग ही जख्मी हुए थे। इनका सरकार ने मुफ्त इलाज करवाया और 50-50 हजार दिए। इन्हें नौकरी की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, जौड़ा फाटक रेल हादसे में 59 लोगों की मौत हुई थी जिनमें से 58 की शिनाख्त हो चुकी है। एक डेडबॉडी की आज तक पहचान नहीं हो पाई। रावण दहन के दौरान हुए इस हादसे में 21 औरतों के सुहाग उजड़ गए तो 23 ने अपने बेटे गंवा दिए। इनमें से 10 की उम्र 18 साल से कम थी। 4 लड़कियों की भी असमय मौत हो गई। 2 की पत्नियां मारी गईं तो एक परिवार ऐसा भी था जिसके चारों सदस्य पटरियों पर कट गए। प्रशासन ने जिन पारिवारिक मेंबरों की फाइलें तैयार की हैं उनमें से 2 ग्रेजुएट हैं जबकि 2 के पास सिविल इंजनियरिंग मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा था। 10 लोग 12वीं, 2 लोग 10वीं और 4 लोग 8वीं पास हैं। 17 लोग अनपढ़ हैं।