सावन का माह शिव जी को अधिक प्रिय होता है और इस माह में भगवान भोलेनाथ की भक्ति सर्वाधिक उत्तम मानी गई है। आज हम इस लेख में आपको त्रिपुंड के बारे में जानकारी देंगे जो कि भगवान शिव अपने शरीर पर धारण करते हैं। तो आइए जानते हैं कि आख़िर त्रिपुंड क्या है और इसका महत्त्व क्या है ?

जानिए कि आख़िर क्या है त्रिपुंड ?

ललाट आदि शरीर के सभी स्थानों में जो भस्म से तीन तिरछी रेखाएं बनाई जाती हैं, उन्हें त्रिपुंड कहते हैं। भौहों के बीच वाले भाग से लेकर जहां तक भौहों का अंत होता है, उतना बड़ा त्रिपुंड ललाट पर धारण करना श्रेष्ठ माना गया है। इसे धारण करने का तरीका या विधि यह है कि मध्यमा और अनामिका अंगुली से दो रेखाएं कर बीच में अंगुठे से की गई रेखा त्रिपुंड कहलाती है। इसके साथ ही आप बीच की तीन अंगुलियों से भस्म लेकर भक्ति भाव से ललाट में त्रिपुंड धारण कर सकते हैं।

त्रिपुंड के बारे में विशेष जानकारी

शिव पुराण के मुताबिक़, त्रिपुंड की तीनों ही रेखाओं में से प्रत्येक के नौ-नौ देवता हैं, जो कि सभी अंगों में स्थित रहते हैं। शिव पुराण के मुताबिक, त्रिपुंड की पहली रेखा में प्रथम अक्षर अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋृग्वेद, क्रियाशक्ति, प्रात:सवन तथा महादेव ये 9 देवता होते हैं। साथ ही इसकी दूसरी रेखा में प्रणव का दूसरा अक्षर उकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्वगुण, यजुर्वेद, मध्यंदिनसवन, इच्छाशक्ति, अंतरात्मा तथा महेश्वर ये 9 देवता निवास करते हैं। वहीं अंतिम और तीसरी रेखा में प्रणव का तीसरा अक्षर मकार, आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीयसवन तथा शिव ये 9 देवता रहते हैं।

जानिए कहां धारण करना चाहिए त्रिपुंड ?

हमे अपने शरीर के 32, 16, 8 या 5 स्थानों पर त्रिपुंड को लगाना चाहिए। इनमें मस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों नेत्र, दोनों नासिका, मुख, कंठ, दोनों हाथ, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, हृदय, दोनों पाश्र्वभाग, नाभि, दोनों अंडकोष, दोनों उरु, दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिंडली और दोनों पैर ये 32 उत्तम स्थान बताए गए हैं। इन पर आप त्रिपुंड को धारण कर सकते हैं। समय की कमी के चलते यदि आप इतने स्थानों पर इसे नहीं लगा सकते हैं तो फिर आप पांच स्थानों मस्तक, दोनों भुजाओं, हृदय और नाभि पर इसे अवश्य धारण करें।