सनातन धर्म में दिवाली का विशेष महत्व है। यह पर्व कार्तिक महीने में अमावस्या के दिन मनाई जाती है। इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी और भगवान श्री गणेश जी की पूजा-उपासना की जाती है। साथ ही घरों में दीप जलाए जाते हैं। इसकी शुरुआत त्रेता युग में हुई थी। कालांतर से कार्तिक महीने की अमावस्या को दिवाली मनाई जाती है। वहीं, दिवाली के 15 दिनों बाद यानी कार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि देव दिवाली के दिन देवताओं का पृथ्वी पर आगमन होता है। आसान शब्दों में कहें तो देव दिवाली के दिन देवता दीपदान हेतु पृथ्वी पर आते हैं। अतः देव दिवाली यानी कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु गंगा नदी में आस्था की डुबकी लगाते हैं। साथ ही देव दिवाली कार्यक्रम में शामिल होते हैं। इस मौके पर गंगा नदी के किनारे पूजा-उपासना, हवन और दीपदान किया जाता है। अगर आप भी देव दिवाली का साक्षी बनना चाहते हैं, तो गंगा किनारे बसे इन शहरों की धार्मिक यात्रा कर सकते हैं

बनारस

दैविक काल से बनारस देव भूमि के नाम से जाना जाता है। यह शहर पवित्र गंगा नदी के किनारे बसा है। बनारस अपनी धार्मिक महत्व के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। हर साल दुनियाभर से पर्यटक बनारस घुमने आते हैं। लोग गंगा आरती में शामिल होकर ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। गंगा किनारे कुल 88 घाट हैं। खासकर मणिकर्णिका घाट अंतिम संस्कार के लिए प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति का अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर होता है, उसे मोक्ष अथवा स्वर्ग की प्राप्ति होती है। अन्य घाटों पर पूजा-अर्चना और गंगा आरती की जाती है। वहीं, देव दिवाली पर दीपदान का विशेष आयोजन किया जाता है। आप बनारस की धार्मिक यात्रा कर सकते हैं। बनारस को बाबा का शहर भी कहा जाता है।

हरिद्वार

उत्तराखंड को देवों की भूमि कहा जाता है। प्रदेश में कई धार्मिक स्थान हैं, जो विश्व प्रसिद्ध हैं। इनमें एक पवित्र और पावन स्थल हरिद्वार है। हरिद्वार सनातनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। वर्तमान समय में भी हरिद्वार में कुंभ मेला का आयोजन किया जाता है। देव दिवाली के मौके पर हरिद्वार में भी दीपदान किया जाता है। इससे पहले दिवाली के मौके पर भी हरिद्वार में गंगा नदी के किनारे दिए जलाए जाते हैं।