तीन साल से जयपुर शहर में एक अजूबा कारनामा करके दिखाया जा रहा है। अजूबा इस लिए कि जो असंभव सा था, उसे छोटी- छोटी ट्रिक्स और भरपूर मेहनत के साथ संभव कर दिखाया है। जो बच्चे आंखों से देख नहीं सकते, उनके चेहरों के  भाव देखकर लोग दंग हो रहे हैं।
मंच पर एक एक कदम नाप कर अपने संवादों से लोगों को चकित कर रहे हैं। नेत्रहीन बच्चों के अनोखे नाटकों को मंच पर उतारा है एक जुनूनी नाट्यकर्मी ने। अपने जीवन के कई साल रंगमंच को समर्पित कर चुके भारत रत्न भार्गव पिछले तीन सालों से नेत्रहीन बच्चों को साथ लेकर उन्हें थिएटर के गुर सिखा रहे हैं। अब सवाल ये कि चौकोर मंच पर जब बीस बच्चे मौजूद हो तो किस तरह वे अपने किरदार और पॉजीशन को सही तरह से निभा सकते हैं। इसका जवाब भार्गव ने बताया। उन्होंने कहा कि इसके लिए हमने म्जूयिकल इंस्ट्रीमेंट्स को हर बच्चे का अलग और खास कोड बनाया।
मसलन एक बच्चे का कोड मंजीरा बनाया। जब तक मंजीरा एक तय ताल में बजता रहेगा तब तक उस बच्चे को चलना होगा। जैसे ही मंजीरा रूका तो बच्चा समझ जाएगा कि उसे उसी जगह रुकना है। बच्चे को अगर दाएं मुड़ना है तो उसके लिए मंजीरे की एक विशेष ताल बजाते हैं, उसी तरह बायें मुड़ने के लिए दूसरी ताल। बस बच्चे अपने इंस्ट्रूमेंट की आवाज और ताल को पकड़ते हैं।

नाट्यकुलम संस्था के तहत तीन साल पहले सबसे पहला नाटक जश्न ए ईद प्रस्तुत किया गया। इस नाटक में 23 दृष्टिबाधित बच्चों को शामिल किया गया। यह नाटक प्रेमचंद के ईदगाह से प्रेरित है। इसमें एक बच्चा अपनी दादी के लिए मेले से चिमटा खरीद कर लाता है।

भार्गव इस नाटक का अंतिम दृश्य में किया दृश्य बताते  हैं। वे कहते हैं कि इस सीन में हामिद अपना चिमटा हवा में लहराता है और सारे बच्चे उसकी तरफ हवा में ही हाथ से इशारा कर बोलते हैं कि हामिद का चिमटा जिंदाबाद। देखने वाले इस नजारे को देख दंग रह गए कि नेत्रहीन बच्चों को हवा में लहराते चिमटे का पता कैसे चला।

दरअसल एक हाथ में चिमटा लिए हामिद दूसरे हाथ से चुटकी बजा रहा था, उसी के इशारे पर बच्चों ने चिमटे का अंदाजा लगाया। दूसरे साल इन बच्चों के साथ अनंत की आंखें नाटक किया गया और इस साल तैयारी है नंदन की कथा।

भार्गव बताते हैं कि इन बच्चों के प्रतिभा को निखारने के लिए जून में कैम्प लगा रहे हैं। जिसमें नाटक के साथ नेत्रहीन बच्चों की अन्य प्रतिभाएं भी निखारने का काम किया जाएगा।