MP में है अपराधियों का स्कूल, मां-बाप ही बच्चों को ट्रेनिंग के लिए भेजते हैं, हर बच्चे की फीस 2-3 लाख रुपए; गैंग ने वकीलों की भी टीम बना रखी है
 


कैलाश सिसोदिया इस गैंग का सरगना है। वह 50 से अधिक वारदात कर चुका है। कॉमर्स से ग्रेजुएशन करने के बाद वह करीब 10 साल से ये कर रहा है। उसने शानदार बंगला बना रखा है।

मध्यप्रदेश का कड़िया गांव चोरों और जेबतराशों की नर्सरी बना हुआ है। यहां छोटी उम्र से ही बच्चों को इन अपराधों की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी जाती है। इसके लिए उनके मां-बाप सरगना को 2-3 लाख रुपए तक की फीस भी देते हैं। चौंकिए मत, यह सच है। इसका खुलासा हाल ही में राजस्थान में हुई 10 लाख की चोरी के बाद मामले की पड़ताल के दौरान हुआ। 25 मार्च को झुंझुनूं के शाहो से एक पूर्व सैनिक के दस लाख रुपए पार कर लिए गए थे। ये पुलिस के लिए बड़ी चुनौती थी। लेकिन सीसीटीवी फुटेज से मिले सुराग के आधार पर आरोपियों की पहचान हो गई। इसके बाद इनकी गिरफ्तारी भी हो गई।

अब राजस्थान पुलिस के लिए नई चुनौती थी रकम की बरामदगी करना। इसके लिए पुलिस टीम अपराधियों के गांव कड़िया पहुंची। यह मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले का गांव है। इसके पास ही दो और गांव हैं। गुलखेड़ी और हुलखेड़ी। इनके बारे में एएसआई, अशोक कुमार ने बताया कि कड़िया गांव में सांसी जाती के 2500 घर हैं। गुलखेड़ी गांव में सांसी के लगभग 1200 और हुलखेड़ी गांव में 500 घर हैं। इनमें से अधिकांश परिवार चोरी, लूट, जेबतराशी, जुआ आदि अपराधों से जुड़े हैं और देशभर में सक्रिय हैं। इन गांवों में पहुंचना इतना आसान नहीं है। ये हमला कर सकते हैं। फिर भी हमने गांव के आसपास रहकर जानकारी जुटाई। यहां कई गैंग सक्रिय हैं। एक-एक गैंग में छह से सात लोग होते हैं। ये लोग देश भर में वारदाते करके यहीं आते हैं। गांव में इनके आलीशान घर हैं। उनमें हर आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। महंगी कारें और बाइक रखना इनका शौक है।

इन अपराधियों में शामिल 19 वर्षीय रितिक हाेश संभालते ही इस धंधे में शामिल हाे गया। वह सात साल से जेब तराशी का काम कर रहा है। 40 से अधिक वारदात कर चुका है। डेढ़ लाख रुपए सालाना लेता है।

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19 वर्षीय रितिक हाेश संभालते ही इस धंधे में शामिल हाे गया। सात साल से जेब तराशी का काम कर रहा है। 40 से अधिक वारदात कर चुका है। डेढ़ लाख सालाना लेता है।

तीन लाख में ट्रेनिंग : जेब काटना, बैग पार करना सिखाते हैं

इन गांवों में बच्चों की ट्रेनिंग गैंग के बड़े सरगना देते हैं। इसके लिए उनसे बाकायदा फीस ली जाती है। यह फीस ढाई से तीन लाख रुपए एक बच्चे की होती है। बच्चे को 12 से 13 साल की उम्र में ही इस ट्रेनिंग की शुरुआत कर दी जाती है। हैरत की बात यह है कि मां-बाप खुद उसे ट्रेनिंग के लिए भेजते हैं और यह तक चेक करते हैं कि कौन सरगना कितनी अच्छी ट्रेनिंग दे सकता है। इस ट्रेनिंग में बच्चे को जेब तराशना, भीड़ के बीच से रकम का बैग पार करना, तेजी से फरार होना। पुलिस पकड़ ले तो कैसे बचना है और पिटाई कैसे सहन करनी है। यह सब सिखाया जाता है। इसके बाद उसे एक साल के लिए गैंग में काम पर रखा जाता है। जिसकी एवज में सरगना उसके मां बाप को साल के तीन से पांच लाख रुपए का भुगतान करता है। इसके लिए ये अपने बच्चों को 10 से 12 साल की उम्र में ही ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं।

पांच साल से इस गिरोह में है। शिकार ढूंढ़ने में एक्सपर्ट है। इस खासियत के लिए उसे 80 हजार रुपए मिलते हैं। जेब तराशी की वारदातें इसे याद भी नहीं है। वह पांच साल से कर रहा है।

पूरी तैयारी : जब भी पकड़े जाते हैं वकीलों की टीम आ जाती है

यह गैंग बड़े शातिर तरीके से वारदात को अंजाम देती है। पहले रेकी करती है और उसके बाद बैंकों के बाहर बड़ी रकम निकालने वाले लोगों के बैग पार कर लेती है। कई बार सामने वाले पर गंदगी डालकर उसे चकमा दिया जाता है। कई बार पता पूछने के बहाने रोककर रकम पार कर ले जाते हैं। जेबतराशी, शादियों से गहने और रकम पार करने जैसी वारदातें भी यही गैंग करती है। ज्यादातर वारदातें बच्चों और महिलाओं से करवाते हैं। जिन्हें जमानत मिल जाती है। बहुत कम ऐसा होता है जब इनके बड़े सरगना पकड़े जाते हैं। उस स्थिति में इनके पास वकीलों की बड़ी टीम है। ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी प्रदेश की पुलिस यहां पहुंची। इससे पहले देश के करीब करीब हर राज्य की पुलिस इन गांवों में आ चुकी थी, लेकिन खाली हाथ ही लौटी।

इंदाैर में हाॅस्टल में रहकर आठवीं तक पढ़ा। चार साल से इस गिराेह में है। डूंगरगढ़ से 30 लाख रुपए से भरा बैग पार किया था। वह कार चलाता है। कई राज्याें का दाैरा कर चुका है।

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सबक : हमारी लापरवाही से ही इन्हें होता है फायदा, इसलिए सचेत रहिए

ये लोग पढ़े लिखे नहीं है। बस, आमजन की लापरवाही का ही ये लोग फायदा उठाते हैं। बैंक से बाहर निकलते समय लोग बेपरवाही से रकम रखते हैं। शादियों में लोग इस कदर बेपरवाह हो जाते हैं कि कुछ ध्यान नहीं रखते। गैंग इन्हीं बातों का फायदा उठाकर वारदातें करती हैं, चूंकि गैंग में बच्चे होते है। इसलिए लोगों को शक भी नहीं होता। झुंझुनूं काेतवाल मदनलाल कड़वासरा ने बताया कि कड़िया गांव में सभी लाेगाें का समान धंधा हाेने से एक दूसरे के बारे में पुलिस काे काेई जानकारी नहीं देते। जब कोई अधिकारी जाता है तो मारपीट करते हैं।