नई दिल्ली । कोरोना काल में सुप्रीम कोर्ट 60 से ज्यादा फैसले दिए, जिनमें सर्वोच्च अदालत ने कई महत्वपूर्ण कानूनी सवालों के जवाब दिए। ये फैसले वर्चुअल सुनवाई के जरिए दिए गए, जो स्वयं में एक रिकॉर्ड है। इनमें से कुछ फैसले ऐसे हैं, जो कई मायनों में अहम हैं। सुशीला अग्रवाल बनाम  जस्टिस अरुण मिश्र अब रिटायर की अध्यक्षता में संविधान पीठ ने कहा गिरफ्तारी से पहले दी गई अग्रिम जमानत की कोई सीमा नहीं हो सकती। यदि कोर्ट के सामने इसी कोई स्थिति है जिसमे अभियुक्त की जमानत को सीमित करना हो , जैसे चार्जशीट दायर होने तक आदि, तो कोर्ट उसे शर्त के साथ सीमित कर सकता है अन्यथा ये असीमित ही रहेगी यानी ट्रायल का फैसला होने तक अभियुक्त जमानत पर बना रहेगा। इस फैसले से इस बहुत बड़े सवाल का जवाब मिल गया। क्योंकि सामान्य तौर पर आरोप तय कर दिए हों या चार्जशीट दायर होते ही या अभियुक्त को कोर्ट द्वारा समन करते ही जमानत को समाप्त मान लिया जाता था। अदालत ने तय किया कि संविधान की 10वीं अनुसूची (दल बदल की स्थिति) के तहत स्पीकर के पास आती सांसदों या विधायकों की अयोग्यता की अर्जी, यदि कोई अपवाद न हो तो तीन माह में निर्धारित होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि स्पीकर एक न्यायाधिकरण की तरह से जारी करता है और इसे तार्किक समय के अंदर फैसला लेना ही होगा जिसके लिए तीन माह उपयुक्त अवधि है। आर एफ नरीमन की तीन जजों की पीठ ने कहा स्पीकर इन अर्जियों को अनंत काल तक लटका नहीं सकते।इसके साथ ही कोर्ट ने बीजेपी के विधायक को विधानसभा में प्रवेश से रोक दिया था और उनका मंत्री पद भी समाप्त कर दिया था।