ध्रुपद मेला की दूसरी निशा में शनिवार को सुर, लय व ताल की रसधार प्रवाहित हुई। डागर घराने के पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ने ध्रुपद गायन से सुधीजनों को मुरीद बना दिया। वहीं दिशारी चक्रवर्ती ने संतूर पर तान छेड़ी। कलाकारों की प्रस्तुतियां का क्रम रात तक चलता रहा।

मैहर घराने के उस्ताद आशीष खान के शिष्य दिशारी चक्रबर्ती के संतूर वादन से शुरुआत हुई। उन्होंने राग पुरिया धनाश्री में आलाप के बाद जोड़ व चौताल में निबद्ध रचना पेश की। पखावज पर निशांत सिंह ने संगत की। इसके बाद डागर घराने के पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ने राग दरबारी में आलाप के साथ चौताल में निबद्ध ध्रुपद रचना बजाई। बोल थे- मुरारी त्रिभुवनपति...। पखावज पर मोहन श्याम शर्मा तथा तानपुरे परडॉ. रिंकू लांबा एवं संतोष कुमार ने संगत की। तीसरी प्रस्तुति पं. राजखुशी राम का स्वतंत्र पखावज वादन की रही। उन्होंने वादन से श्रोताओं को झूमा दिया। उन्होंने विविध लयकारीयो को साकार किया। परन बजाकर समापन किया। हारमोनीयम पर जमुना बल्लभ गुजराती ने संगत की। इस क्रम में कोलकाता डॉ. कावेरीकर का गायन हुआ। उन्होंने राग काम्बोजी में आलाप के बाद चौताल में निबद्ध ध्रुपद रचना पेश किया। बोल थे- ए महादेव...। पखावज पर मिथुन चक्रवर्ती एवं तानपुरे पर सुरश्री और रूपम ने संगत की। पं. रवींद्र गोस्वामी का सुरबहार, शिशिर करमाकर, असित राय, सुमित आनंद पाण्डेय का गायन एवं शिराज अली खां का सरोद वादन सहित अन्य कलाकारों की देर रात तक प्रस्तुतियां हुईं। संयोजक महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र एवं पद्मश्री पं. राजेश्वर आचार्य तथा संचालन डॉ. प्रीतेश आचार्य ने किया।