भगवान शिव का प्रिय त्योहार महाशिवरात्रि नजदीक है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चर्तुदशी को मनाया जाता है। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का एक विशेष महत्व है। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग को भी पूजा जाता है। देवों के देव महादेव शंकर भगवान से जुड़ी जो सबसे खास बात है वो यह है कि केवल शिव ही हैं जिन्हें मूर्ति और निराकार लिंग दोनों रूपों में पूजा जाता है। आज हम आपको शिवलिंग से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बताएंगे।
मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा करने मात्र से समस्त ब्रह्मांड का पूजन हो जाता है क्योंकि शिव ही समस्त जगत के मूल हैं। शिवलिंग के शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो ‘शिव’ का अर्थ है ‘परम कल्याणकारी’ और ‘लिंग’ का अर्थ होता है ‘सृजन’। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिंह या प्रतीक होता है। इस तरह शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक। भगवान शिव को देव आदिदेव भी कहा जाता है। जिसका मतलब है कोई रूप ना होना। भगवान शिव अनंत काल और सृजन के प्रतीक हैं। भगवान शिव प्रतीक हैं, आत्मा के जिसके विलय के बाद इंसान परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
शिवलिंग का महत्व

शिवलिंग के संदर्भ में स्कन्दपुराण में आकाश को भी लिंगस्वरूप माना गया है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती हुई पृथ्वी तथा समस्त अनंत ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) की धुरी है। शिवलिंग का अर्थ अनंत भी है जिसका मतलब है कि इसका कोई अंत नहीं है न ही प्रारंभ है। वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में मिल जाता है और फिर संसार इसी शिवलिंग से सृजन होता है। इसलिए विश्व की संपूर्ण ऊर्जा का प्रतीक शिवलिंग को माना गया है। लिंग शिव का ही निराकार रूप है। मूर्तिरूप में शिव की भगवान शंकर के रूप में पूजा होती है। शिवलिंग का इतिहास कई हजार वर्षों पुराना है। आदिकाल से शिव के लिंग की पूजा प्रचलित है। सभी देव देवताओं में शिव ही एकमात्र भगवान हैं जिनके लिंगस्वरूप की आराधना की जाती है। इस संदर्भ में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथाएं और मान्यताएं हैं।

कहा जाता है समुद्र मंथन के समय में विष समाप्त करने के लिए शिव ने सारा विष अपने कंठ में रख लिया। शिव का कंठ विष पीकर नीले रंग का हो गया। वह नीलकंठ कहे जाने लगे, लेकिन विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया। उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज भी चली आ रही है। श‍िवलिंग को भगवान श‍िव का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। इसकी पूजा विधिविधान से की जाती है।
ऐसे हुई श‍िवलिंग की उत्‍पत्‍त‍ि
लिंगमहापुराण के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद हो गया। जब उनका विवाद बहुत अधिक बढ़ गया, तब अग्नि की ज्वालाओं के लिपटा हुआ लिंग भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच आकर स्थापित हुआ था, दोनों उस लिंग का रहस्य नहीं समझ पाए। इस रहस्य के बारे में विष्णु भगवान और ब्रह्मदेव ने हजार वर्षों तक खोज की फिर भी उन्हें उस लिंग का स्त्रोत नहीं मिला। निराश होकर दोनों देव फिर से वहीं आ गए जहां उन्होंने लिंग को देखा था। वहां आने पर उन्हें ओम की ध्वनि सुनाई दी, जिसको सुनकर उन्हें अनुभव हुआ कि कि यह कोई शक्ति है और उस ओम के स्वर की आराधना करने लगे। भगवान ब्रहमा और भगवान विष्णु की आराधना से प्रसन्न होकर उस लिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और सद्बुद्धि का वरदान दिया। देवों को वरदान देकर भगवान शिव चले गए हो गए और एक शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए। यही भगवान शिव का पहला शिवलिंग माना गया। सबसे पहले भगवान ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के उस लिंग की पूजा-अर्चना की थी। तब से भगवान शिव की लिंग के रूप में पूजा करने की परम्परा की शुरुआत मानी जाती है।