छ्त्तीसगढ़ . छ्त्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में भगवान राम (Lord Ram) के वनवास काल से संबंधित जिन स्थानों को पर्यटन-तीर्थ के रूप में विकसित किया जा रहा है, उनमें कोरिया जिले का सीतामढी-हरचौका तथा सरगुजा का रामगढ़ भी शामिल है. इनमें से रामगढ़ की प्रसिद्धि विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला के लिए भी है. महाकवि कालिदास ने अपनी कालजयी कृति मेघदूतम् की रचना यहीं पर की थी. वनवास के दौरान भगवान राम ने कोरिया (Koriya) जिले से ही छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया था. भरतपुर तहसील के जनकपुर में स्थित सीतामढ़ी-हरचौका को उनका पहला पड़ान माना जाता है. मवाई नदी के किनारे स्थित सीतामढ़ी-हरचौका की गुफा में 17 कक्ष हैं. इसे सीता की रसोई के नाम से भी जाना जाता है. वहां एक शिलाखंड हैं जिसे लोग भगवान राम का पद-चिन्ह मानते हैं. मवाई नदी तट पर स्थित गुफा को काट कर 17 कक्ष बनाए गए हैं, जिनमें शिवलिंग स्थापित हैं.  इसी स्थान को हरचौका (रसोई) के नाम से जाना जाता है. भगवान राम हरचौका से रापा नदी के तट पर स्थित सीतामढ़ी-घाघरा पहुंचे थे. यहां करीब 20 फीट ऊपर 4 कक्षों वाली गुफा है, जिसके बीच में शिवलिंग स्थापित है. आगे की यात्रा में वे घाघरा से निकलकर कोटाडोला होते हुए सरगुजा जिले की रामगढ़ पहाड़ी पहुंचे थे. यह अम्बिकापुर- बिलासपुर मार्ग पर स्थित है. इसे रामगिरि भी कहा जाता है. महाकवि कालिदास के मेघदूत में इसी स्थान के दृश्यों को बताया गया है. माना जाता है कि वनवास के दौरान श्री राम ने पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ यहां कुछ दिन बिताये थे, इसीलिए वहां स्थित गुफाएं  उन्हीं के नाम से जानी जाती हैं. राम के तापस्वी वेश के कारण एक का नाम जोगीमारा, दूसरे का सीता बेंगरा एवं एक अन्य का लक्ष्मण गुफा पड़ गया.