पुराणों में वर्णित है कि शरद पूर्णिमा को रात बारह बजे चन्द्रमा से अमृत बरसता है। इतना ही नहीं धन-धान्य की देवी समृद्धि एवं श्रीभंडार भरने के लिए रात्रि भ्रमण पर निकलती है। ऐसा माना जाता है कि गाय के दूध से बनी खीर को छत पर रात्रि में रख देने से अर्द्धरात्रि को चन्द्र किरणों के माध्यम से उसके अमृत पहुंचता है। जो सुख-समृद्धि, स्वास्थ्यवर्धक शांति एवं धन-धान्य प्रदान करता है। महिलाएं इस दिन व्रत रखती है। सन्ध्या के समय डेढ़ पाव माबे में डेढ़ पाव शक्कर मिलाकर उसको तीन भाग में बांट कर प्रसाद बनाया जाता है, फिर उससे लक्ष्मी जी को भोग लगाया जाता है। बच्चों को इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। 
जहां दिन में मावे की मिठाई खाने को मिलती है। वही रात में अमृतमयी खीर का लुप्त उठाया जाता है। लेकिन समय के साथ इस त्यौहार में भी वैसी रौनक अब नहीं रही। पहले जहां समूचा परिवार मिलजुल कर आधी रात तक तरह-तरह के खेल, ताश, अंताक्षरी, कैरम बोर्ड, शतरंज एवं अन्य कई देशी गेम्स खेलता था, और पता ही नहीं लगता था कि कब रात के एक दो बज गये। जिसके बाद पूजा-पाठ कर समूचा परिवार एक साथ भोजन ग्रहण करता था। कई जगह पर तो पूरा मोहल्ला एक सार्वजनिक स्थान पर मिलकर भी कार्यक्रम आयोजित करते थे। लेकिन अब इन चीजों में कमी आई है। घर में बच्चें नहीं रहते कोई पढ़ते तो कोई नौकरी करने घर से बाहर गये हुए रहते है। रही-सही कसर टी.बी. ने पूरी कर दी है। अब टीवी पर ही लोग लगे रहते है, समाजिकता में कमी आई है। वह तो हमारे भारतीय संस्कार इतने गहरे है कि इन सब परेशानियों के बाबजूद हम अपनी परम्पराओं को जीवित रखने में सक्षम है। प्रतिवर्षानुसार 24 अक्टूबर को शरद पुर्णिमा का आयोजन शृद्धा एवं भक्ति के साथ किया जाएगा।