उन दिनों विजय नगर में संत पुरंदर की ख्याति बढ़ती ही जा रही थी। हर प्रकार के मोह-माया से मुक्त त्यागमूर्ति पुरंदर अपनी पत्नी के साथ नगर से बाहर एक कुटिया में रहते थे और भिक्षा मांग कर गुजारा करते थे। उनके नाम की चर्चा उड़ते-उड़ते राजा कृष्णदेव राय तक भी पहुंची। उन्हें लगा कि उन्हें संत के लिए कुछ करना चाहिए। एक दिन उन्होंने तेनालीराम से कहा- जाओ संत पुरंदर से कहो कि वे भिक्षा के लिए दर-दर न भटकें और केवल राजमहल से भिक्षा लिया करें। राजा ने इसी बहाने उनकी दरिदता दूर करने का उपय सोच लिया था। अब संत रोज राजमहल आने लगे।  
उन्हें भिक्षा में अनाज के साथ छोटे-मोटे कीमती पत्थर भी दिए जाते थे। राजा को लगता था कि संत के पास जल्दी ही अच्छी-खासी संपत्ति जमा हो जाएगी। पर मन में सवाल भी उठता था कि आखिर ये कैसे संत हैं जो ये कीमती रत्न स्वीकार कर रहे हैं। कहीं ये संत होने का ढोंग तो नहीं कर रहे। एक दिन राजा और तेनालीराम भेस बदलकर संत की कुटिया में पहुंचे। राज को देखकर हैरत हुई कि संत की कुटिया में कोई बदलाव नहीं आया था। उनकी पत्नी चावल बीनते हुए बुदबुदा रही थीं कि पता नहीं कहां से कंकड़-पत्थर आ जाते हैं। राजा ने चावल हाथ में लेकर कहा-पर ये तो हीरे-मोती हैं। इनसे आपकी दरिदता दूर हो सकती थी। संत की पत्नी ने कहा-हमारे लिए तो ये कंकड़-पत्थर ही हैं। धन और विनम्रता ही हमारा धन है। यह सुनकर राजा लज्जित हो गए। उन्होंने संत और उनकी पत्नी से क्षमा मांगी।