संत बेनजोई के पास कई बालक शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। वह अपने सभी शिष्यों की शिक्षा पूर्ण करने के बाद ही उन्हें वहां से जाने की अनुमति देते थे। वह उद्दंड व शरारती शिष्यों को भी आज्ञाकारी और संस्कारी बनाकर ही दम लेते थे। एक बार उनके आश्रम में बहुत ही शरारती और बदतमीज लड़का आया। एक दिन वह चोरी करते हुए पकड़ा गया। बेनजोई ने उसे चोरी की बुराइयों से अवगत कराया और क्षमा कर दिया, लेकिन वह लड़का इतना बिगड़ैल था कि उस पर बेनजोई की शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने दोबारा चोरी की और एक शिष्य को बेवजह पीट दिया। यह शिकायत बेनजोई तक पहुंची तो उन्होंने उसे फिर बुलाकर प्रेम से समझाया और एक बार फिर क्षमा कर दिया। यह देखकर आश्रम के अन्य शिष्य आगबबूला हो गए। शाम की प्रार्थना के समय सभी शिष्य एकजुट होकर बोले, 'गुरुजी, यह बार-बार चोरी करता रहेगा, हमें पीटता रहेगा और आप उसे क्षमा करते रहेंगे। यह कैसा न्याय है? यदि आप इसे आश्रम से नहीं निकाल सकते तो हम सभी यह आश्रम छोड़कर चले जाते हैं।'  
इस पर बेनजोई विनम्रता से बोले, 'मैंने माना कि तुम सब अच्छे हो, संस्कारी हो। कभी किसी कुसंग में न रहने के कारण दुष्कर्मों से दूर हो। यह अबोध किशोर अपने दुर्व्यसनी पिता और भाइयों द्वारा ठुकराया हुआ है। इसे मैं सुधारने, संस्कारित करने के उद्देश्य से यहां लेकर आया हूं। मुझे यह भी मालूम है कि तुम यदि इस आश्रम से चले गए तो अन्य किसी शिक्षक से शिक्षा प्राप्त कर सकते हो, किंतु इस बिगड़ैल लड़के को कौन अपने यहां रखेगा? इसे सुधरने का मौका कैसे मिलेगा?' वह किशोर भी यह सब सुन रहा था। उसकी आंखें भर आईं। वह उनसे क्षमा मांगते हुए बोला, 'गुरुजी, मुझे माफ कर दीजिए। फिर कभी आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।' उसने अन्य शिष्यों से भी माफी मांगी।