भोपाल । राजधानी का राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) के कतिपय फैकल्टीज के संविलियन, नियुक्ति एवं पीएचडी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस आशय की शिकायतें राजभवन, कुलपति व रजिस्ट्रार से की जा रही हैं। एक शिकायत आरटीआई एक्टिविस्ट नितिन अग्रवाल ने राजभवन में की थी, जिसमें फैकल्टी असीम तिवारी के संविलियन, प्रतिनियुक्ति और पीएचडी पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं एक अन्य शिकायत डिप्टी रजिस्ट्रार राजेश भार्गव जो कि पीएचडी प्रभारी है उनकी नियुक्ति पर भी उठाए गए हैं। बताया जा रहा है कि असीम तिवारी बिना संविलियन के तथा बिना प्रतिनियुक्ति वृद्घि के 2006 से विवि में कार्य कर रहे हैं। शासन के 18 मई 2005 को जारी हुए आदेश के अनुसार उन्हें एक वर्ष की प्रतिनियुक्ति पर रीवा भेजा गया था। जिसके बाद प्रतिनियुक्ति में कोई वृद्घि नहीं हुई। 2014 में प्रतिनियुक्ति समाप्त करने व कार्यमुक्त करने के आदेश के खिलाफ वे 13 नवंबर 2014 को हाईकोर्ट जबलपुर पहुंचे। जहां से उन्हें अंतरिम आदेश तक आरजीपीवी में कार्य करने की अनुमति दी गई लेकिन 2016 में हाईकोर्ट ने अंतिम आदेश जारी कर दिया। इसकी सूचना अब तक उन्होंने शासन को नहीं दी है। मामले की शिकायत के बाद राजभवन ने कार्रवाई के निर्देश कुलपति को दिए हैं। 
    इधर, विवि में डिप्टी रजिस्ट्रार राजेश भार्गव की नियुक्ति पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। वे एसवी पॉलीटेक्निक में सिविल विभाग के लेक्चरर थे। उप कुलसचिव के पद के लिए कम से कम एसोसिएट प्रोफेसर होना जरूरी है। जिस समय इनकी विवि में पदस्थापना हुई है तब तक इनकी पीएचडी भी नहीं हुई थी। विवि में रहते हुए इन्होंने अपनी पीएचडी और दोबारा कोर्स वर्क पूरा किया है जो नियमों के विरुद्घ है। बता दें कि पूर्व में पीएचडी विभाग में बतौर सहायक कुलसचिव नियुक्त सहायक प्राध्यापक डॉ पियूष शुक्ला को भी शिकायतों के चलते हटाया गया था लेकिन अपात्र होते हुए भी वे पीएचडी गाइड बन गए हैं। हालांकि उन पर पहले भी आरोप लग चुके हैं। इधर, यूआईटी डायरेक्टर आरएस राजपूत को नियम विरुद्घ संचालक बनाए जाने सहित अन्य आरोप लग चुके हैं। शिकायतकर्ता ने बताया कि असीम तिवारी की पीएचडी फर्जी है। इसमें विदेशी रिसर्चर के शोधपत्रों पर उनका नाम हटाकर स्वयं का नाम लिखा गया है। 2009 में नियम विरुद्घ हुई इस पीएचडी के लिए 240 दिन की उपस्थिति अनिवार्य है लेकिन तिवारी की उपस्थिति कहीं नहीं पाई गई है। खास बात तो यह है कि बीई और एमटेक मैकेनिकल इंजीनियरिंग में करने के बावजूद पीएचडी एनर्जी में की गई है। विवि के तत्कालीन कुलपति पीयूष त्रिवेदी के कार्यकाल में यह डिग्री हुई है। जिसकी जांच कराई जाना चाहिए।