बिजोलिया- नगरी कला इतिहास की, नगरी किसान आन्दोलन की। राजस्थान के इतिहास में दर्ज है वो किसान आन्दोलन जिसने विजय सिंह पथिक और साधु सीतारामदास के नामों को अमर कर दिया। किसान आन्दोलन की इस पावन धरा बिजोलिया पर जब कला के फूल खिले तो विरासत का अमर इतिहास रच गया। आन्दोलनकारियों के नाम भले ही लोगों की जुबां चढ़ गए परन्तु कलाकारों के नाम हमेंशा गुम ही रहते हैं। छैनी से कला संसार की रचना करने वालों की जगहां पर इतिहास में दर्ज होते हैं, राजकुलों के नाम। वो राजकुल जिनके प्रक्षय में में कला पल्लवित होती है।
भीलवाड़ा जिले के बिजोलिया में चौहन वंश के दबदबे के बाद गुहिल, परमार और पंवार राजवंशियों का राज्य रहा। अपने मन्दिरों के मोहक अंकन के लिए ख्यात बिजोलिया में चौहानो के समय की कला के दर्शन किए जा सकते हैं। अिजोलिया स्थित तीन मन्दिरों के निर्माण काल को 11वीं से 13 शताब्दी के मध्य बताया जाता है। 
महाकालेश्वर मंदिर
इनमें सबसे प्राचीन महाकालेश्वर का मंदिर है। मंदिर लकुलीश सम्प्रदाय (शैव) से सम्बंधित है। आमतौर पर मन्दिर का एक ही गर्भगृह होता है परन्तु इस मन्दिर में दो गर्भगृह हैं। प्रवेश मंडप के द्वार के दोनों तरफ  माँ पार्वती तथा गणेश की प्रतिमा विराजित है। प्रवेश मंडप के अन्दर दोनों ओर भगवान् शिव की छवि लकुलीश प्रतिमाओं के रूप में देखी जा सकती है।  रखी हुई है7 मंदिर के सभामंडप में नंदी की अपूर्ण प्रतिमा स्थापित है। नंदी को पूर्ण रूप से शिल्पांकित नहीं किया जा सका है। सभामंडप का शिखर अद्भुत शिल्पकारी से सज्जित है। सभामंडप के सामने अर्धमंडप भी बना हुआ है। उदोनों गर्भगृहों में शिवलिंग स्थापित हैं। इनके पास ही सीढिय़ा बनी हुई हैं जो एक बावड़ी पर जाकर समाप्त होती हैं। शिवलिंगों का जलाभिषेक इसी बावड़ी के जल से किया जाता है। गर्भगृह का ललाट हो या चौखट, सुन्दर शिल्पकार्यों से सज्जित है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर मूर्तियों का कलात्मकता मन मोहने वाली है। 
हजारेश्वर मंदिर 
महाकालेश्वर मंदिर के समीप ही दाई तरफ उन्नत शिखर वाला हजारेश्वर महादेव मंदिर है जिसका निर्माण भूमिज शैली में किया गया है। इस मन्दिर में एक ही गर्भगृह है, साथ ही एक सभामण्डप भी है। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग ही मन्दिर की प्रमुख विशेषता है। शिवलिंग काफी ऊँचा है तथा उस पर सहस्त्रो छोटे छोटे शिवलिंग उत्कीर्ण हं। संभवत शिवलिंग के इस अदभुत शिल्प के कारण ही मन्दिर ने हजारेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्धि पाई। मंदिर काम्प्लेक्स में लगे भारतीय पुरातत्व विभाग के सुचना पट के अनुसार इस मंदिर के मंडप में एक शिलालेख उत्कीर्ण है जिसके अनुसार ये मंदिर 12 वी शताब्दी का है।
उन्डेश्वर महादेव मंदिर
महाकालेश्वर मंदिर के पीछे एक कलात्मक मंदिर निर्मित है जिसे उन्डेश्वर महादेव मंदिर कहते हैं। इस मंदिर का  गर्भगृह सामान्य से अधिक गहराई पर बना हुआ है। यहां भी एक शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के प्रवेश मंडप के आगे निर्मित सभामण्डप मकर तोरण द्वारों से सज्जित है। इन पर की गई शिल्पकारी अद्भुत है। इस मंदिर के चारों ओर सुन्दर कलात्मक मूर्तियां अंकित हैं।
उन्डेश्वर महादेव मंदिर के आगे एक प्राचीन कुंड है जिसेे मंदाकिनी कुंड कहा जाता है। कुंड चारो तरफ से ऊँची दीवार से घिरा हुआ है। कुण्ड तक जाने के लिए तीन प्रवेश मार्ग बनाए गए हैं, जिनकी सीढिय़ां इस कुण्ड तक ले जाती हैं। कहा जाता है कि, इस कुंड का जल आज तक नहीं सूखा है। बारहों मीिने ही कुंड जल रसे भरा रहता है। कुंड की दीवारों पर अनेक शिलालेख उत्कीर्ण है जिनमे से कुछ पिण्डदान से सम्बंधित है। मंदाकिनी कुंड के कारण ही इन तीनो मंदिरर समूह को मंदाकिनी मंदिर भी कहा जाता है।
 
जैन मंन्दिरों की शोभा
बिजोलिया बस्ती के दक्षिणी पूर्वी भाग में जैन मंदिर बने हुए हैं। कोटा जाने वाले हाईवे से एक सीधा रास्ता जो बूंदी की तरफ जाता है वहा से एक रास्ता इन मंदिरों की तरफ जाता है। यहां निर्मित पाश्र्वनाथजी का मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से अद्भुत है। यह मन्दिर पंचायतन शैली में बना हुआ है। इस मन्निदर के निकट भी एक प्राचीन कुंड बना हुआ है जिसे रेवती कुंड कहते है। पाश्र्वनाथ के इस भव्य मन्दिर के पास ही प्राचीन जैन मंदिरों के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं। इन भग्र मन्दिरों की संख्या सात है।
 
जैन मन्दिर के शिलालेख
पाश्र्वनाथ मन्दिर के आगे की चट्टानों पर दो शिलालेख उत्कीर्ण किए गए हैं। इन शिलालेखों के संरक्षण हेतु उसके चारो तरफ एक कक्ष सा बना कर ऊपर एक कांच का बॉक्स लगा दिया गया है। उसके दरवाजो को ऊपर उठा कर शिलालेखों को देखा व पढ़ा जा सकता है। शिलालेख में विक्रम संवत 1226 (1169 ईस्वी) में पोरवाड जाती के श्रेष्ठी प्रवर सियक के पुत्र  महाजन लोलाक द्वारा जैन मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है। इनमें चौहान शासक सोमेश्वर तथा उनकी वंशावली भी दी गई है। साथ ही बिजोलिया के समीप स्थित मेनाल के मंदिरों का एक तीर्थ स्थल के रूप में उल्लेख किया गया है। ये शिलालेख अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनपर जैन सम्प्रदाय से सम्बंधित उन्नत शिखर पुराण उत्कीर्ण किया गया है जिसमे 5 सर्ग है तत: 294 छंद है। शिलालेख के अनुसार इसी स्थान पर जैन तीर्थंकर पाश्र्वनाथ ने 98 दिवस तक महातप किया था तथा उन्हें यही केवली प्राप्त हुई थी। इन शिलालेखो के पास स्थित चट्टानों पर हजारों की संख्या में पगलिये (पांवो के चिन्ह) उत्कीर्ण है।
 
- राहुल सेन
वरिष्ठ पत्रकार