नई दिल्ली |  लद्दाख सीमा पर चीनी सेना का अड़ियल रवैया जारी है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी लद्दाख के पैंगोंग त्सो और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र पर अब भी फॉरवर्ड पोजिशन पर काबिज है और वादे के मुताबिक ड्रैगन डी-एस्केलेशन के कोई संकेत नहीं दे रहा है। ऐसी स्थिति में चीन को सबक सिखाने और उसकी हेकड़ी तोड़ने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर एक और एक्शन लेने की योजना बना रही है। भारत का अर्थ व्यापार है, यह संदेश देने के लिए मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर चीन के साथ आगे की कार्रवाई पर विचार कर रही है। 

इस मामले से परिचित वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के अनुसार, शीर्ष चीन अध्ययन समूह (सीएसजी) ने सोमवार को लद्दाख में जमीन पर चीनी सेना की कार्रवाई और तिब्बत के कब्जे वाले अक्साई चीन क्षेत्र में उसकी सैन्य मुद्रा पर चर्चा की। दरअसल, सीएसजी वह निकाय है, जो चीन के साथ कार्रवाई पर देश की क्या रणनीति होगी, इसकी सिफारिश करता है। सीएसजी में केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण सदस्य शामिल होते हैं। इसमें भारत सरकार के वरिष्ठ मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सहित सैन्य और अन्य संबंधित सरकारी एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हैं।

चीन चाहता है कि भारत सीमा पर अभी की स्थिति के आधार पर राजनयिक संबंधों को सामान्य करे, जबकि मोदी सरकार का दृढ़ता से मानना है कि लद्दाख क्षेत्र में यथास्थिति (पहले की स्थिति) से कम कुछ भी अस्वीकार्य है। आक्रामक होने के बावजूद चीनी सेना यानी पीएलए का मानना है कि उसके सैनिक लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा की अपनी धारणा के भीतर ही हैं। 

अधिकारियों के अनुसार, भारतीय सेना को लद्दाख में 1597 किलोमीटर वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ फॉर्वर्ड पोजिशन पर बने रहने के लिए कहा गया है। 5 जुलाई को सीमा वार्ता पर भारतीय विशेष प्रतिनिधि ने दो घंटे से अधिक समय तक अपने चीनी समकक्ष से बात की।

दोनों ने तय किया था कि दोनों पक्ष पूरी तरह से अलग हो जाएंगे और फिर डी-एस्केलेट हो जाएंगे, मगर एक महीने बाद स्थिति चीन के साथ एक कूटनीतिक पेशकश के साथ एक गतिरोध पर पहुंच गई है। दरअसल, चीन दुनिया की नजर में अच्छा बने रहने के लिए कूटनीतिक पेशकश कर शांति वार्ता के जरिए इसे सुलझाने की बात कर रहा है, मगर वह पीछे हटने को भी तैयार नहीं है। भारत को आपत्ति इसी बात से है कि जब तक चीनी सेना पीछे नहीं हटती, तब तक शांति की बात करना भी बेमानी ही है।

क्योंकि अब अमेरिका ने हुवावई और इसकी सहयोगी कंपनी पर जासूसी के लिए एक्शन लेकर चीन को झटका दिया है। ऐसे में संभव है कि भारत भी निकट भविष्य में बड़ा एक्शन लेगा। यह स्पष्ट है कि भारत चीनी संचार और बिजली कंपनियों को भविष्य की किसी भी परियोजना से बाहर रखेगा। मोदी सरकार स्पष्ट है कि द्विपक्षीय संबंध सीमा शांति के साथ सीधे जुड़े हुए हैं और अतीत की तरह उन्हें समानांतर ट्रैक पर नहीं आने देंगे। बता दें कि अमेरिका ने सोमवार को हुवावेई को लेकर सख्ती बढ़ा दी। इसके तहत उसने कंपनी की 21 देशों में 38 संबद्ध इकाइयों को अपनी निगरानी सूची में शामिल किया है। अमेरिका इन कदमों के जरिए यह सुनिश्चित कर रहा है कि कंपनी किसी तरीके से उसके कानून के साथ खिलवाड़ नहीं करे।