मुनि ने सेठ की पुत्रवधू से पूछा, 'श्वसुरजी कहां हैं? उसने कहा, 'जूते की दुकान पर गए हैं।' श्वसुर उस समय आराधना-कक्ष में आराधना कर रहा था। उसने सुना, वह तत्काल आया और बोला, 'महाराज! मेरी पुत्रवधू ने असत्य कहा है। मैं आराधना कर रहा था। इसने जानते हुए भी असत्य कहा है।' 
मुनि ने सेठ से कुछेक प्रश्न पूछे। पूछते-पूछते एक प्रश्न के उत्तर में सेठ ने कहा, 'धर्म की आराधना तो चल रही थी, किन्तु एक बात मन में चक्कर लगा रही थी कि आराधना पूरी होते ही मैं दुकान पर जाकर जूते खरीदूंगा। जूते फट गए हैं, अच्छा नहीं लगता। कब आराधना पूरी हो और कब मैं जूते वाले के यहां जाऊं। इसी विचार से आराधना पूरी कर अब बाहर आया हूं।' 
मुनि बोले, 'सेठजी! तुम्हारी पुत्रवधू ने सत्य ही तो कहा था। तुम्हारा शरीर आराधना-कक्ष में था, पर चित्त जूते की दुकान के चक्कर लगा रहा था। बिना चित्त के आराधना कैसी?'  प्रत्येक आदमी की आज यही दशा है। उसका चित्त किसी और दिशा में जा रहा है और शरीर किसी भिन्न दिशा में है। हमारा शरीर स्नायविक प्रिया के आधार पर काम करता है। कोई व्यक्ति जब पहले दिन सीढियों पर चढ़ता है, तब सावधानी से पैर रखता है। दस-बीस बार उन सीढियों पर चढ़ चुकने के बाद पैर अभ्यस्त हो जाते हैं। इसी प्रकार हमारे शारीरिक स्नायुओं को अभ्यास हो जाता है, फिर काम के साथ चित्त को जोड़ना नहीं पड़ता। काम यंत्रवत् पूरा हो जाता है। हमें पता ही नहीं चलता। एक सफल सूत्र है-वर्तमान में जीना।