प्राचीनकाल में हिंदू पूजा-आरती नहीं, संध्यावंदन करता था। 8 प्रहर की संधि में उषाकाल और सायंकाल में संध्यावंदन की जाती है। परंतु कालांतर में मूर्ति पूजा के प्रचलन के बाद पूजा का रूप विकसित हुआ। अब हिन्दू धर्म में संध्योपासना के 5 प्रकार हैं- 1. संध्यावंदन, 2.प्रार्थना, 3. ध्यान, 4. कीर्तन और 5. पूजा-आरती। व्यक्ति की जिसमें जैसी श्रद्धा है, वह वैसा करता है। पूजा या आरती साकार की उपासना का रूप है जो निराकार की ओर बढ़ाया गया पहला कदम माना जाता है।
कुछ विद्वान मानते हैं कि घर में पूजा का प्रचलन मध्यकाल में शुरू हुआ, जबकि हिन्दुओं को मंदिरों में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और उनके अधिकतर मंदिर तोड़ दिए गए थे। इसी कारण उस काल में बनाए गए मंदिर घर जैसे होते थे जिसमें गुंबद नहीं होता था। घर में पूजा करते वक्त कोई पुजारी नहीं होता जबकि मंदिर में पुजारी होता है, जो विधिवत पूजा और आरती करता है। वर्तमान में घर में पूजा के प्रचलन के चलते लोग मंदिर कम ही जाते हैं। अत: उचित होगा कि सप्ताह में एक बार मंदिर में जरूर पूजा-अर्चना करें और हो सके तो गुरुवार या रविवार के दिन ही करें। क्योंकि यही दो ऐसे वार हैं जो धर्मानुसार उचित हैं। पूजा कहीं भी करें पर जानिए कि पूजा और आरती क्या है।

पूजा-आरती : पूजा को नित्यकर्म में शामिल किया गया है। पूजा करने के पुराणिकों ने अनेक मनमाने तरीके विकसित किए हैं। पूजा किसी देवता या देवी की मूर्ति के समक्ष की जाती है जिसमें गुड़ और घी की धूप दी जाती है, फिर हल्दी, कंकू, धूप, दीप और अगरबत्ती से पूजा करके उक्त देवता की आरती उतारी जाती है। पूजा में सभी देवों की स्तुति की जाती है। अत: पूजा-आरती के भी नियम हैं। नियम से की गई पूजा के लाभ मिलते हैं।

समय : 12 बजे के पूर्व पूजा और आरती समाप्त हो जाना चाहिए। दिन के 12 से 4 बजे के बीच पूजा या आरती नहीं की जाती है। रात्रि के सभी कर्म वेदों द्वारा निषेध माने गए हैं, जो लोग रात्रि को पूजा या यज्ञ करते हैं उनके उद्देश्य अलग रहते हैं। पूजा और यज्ञ का सात्विक रूप ही मान्य है।

पूजा संस्कृत मंत्रों के उच्चारण के साथ की जाती है। पूजा समाप्ति के बाद आरती की जाती है। यज्ञ करते वक्त यज्ञ की पूजा की जाती है और उसके अलग नियम होते हैं। पूजा करने से देवता लोग प्रसन्न होते हैं। पूजा से रोग और शोक मिटते हैं और व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।
पूजा के 5 प्रकार :

1- अभिगमन : देवालय अथवा मंदिर की सफाई करना, निर्माल्य (पूर्व में भगवान को अर्पित (चढ़ाई) की गई वस्तुएं हटाना)। ये सब कर्म 'अभिगमन' के अंतर्गत आते हैं।

2- उपादान : गंध, पुष्प, तुलसी दल, दीपक, वस्त्र-आभूषण इत्यादि पूजा सामग्री का संग्रह करना 'उपादान' कहलाता है।

3- योग : ईष्टदेव की आत्मरूप से भावना करना 'योग' है।

4- स्वाध्याय : मंत्रार्थ का अनुसंधान करते हुए जप करना, सूक्त-स्तोत्र आदि का पाठ करना, गुण-नाम आदि का कीर्तन करना, ये सब स्वाध्याय हैं।
5- इज्या : उपचारों के द्वारा अपने आराध्य देव की पूजा करना 'इज्या' के अंतर्गत आती है।

आरती : आरती कई प्रकार की होती है। जैसे मंगल आरती, पूजा आरती, धूप आरती, भोग आरती, श्रृंगार आरती, संध्या आरती, और शयन आरती। मथुरा वृंदावन के मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण की अष्ट प्रहर की आरती करते हैं। पूजा के बाद आरती की जाती है। आरती को 'आरात्रिक' अथवा 'नीराजन' के नाम से भी पुकारा गया है। साधारणतया 5 बत्तियों वाले दीप से आरती की जाती है जिसे 'पंचप्रदीप' कहा जाता है। इसके अलावा 1, 7 अथवा विषम संख्या के अधिक दीप जलाकर भी आरती करने का विधान है। सभी का अलग अलग महत्व है। शंख-ध्वनि और घंटे-घड़ियाल पूजा के प्रधान अंग हैं। किसी देवता की पूजा शंख और घड़ियाल बजाए बिना नहीं होती। आराध्य के पूजन में जो कुछ भी त्रुटि या कमी रह जाती है, उसकी पूर्ति आरती करने से हो जाती है।

कैसे करें पूजा :

1. पूजन में शुद्धता व सात्विकता का विशेष महत्व है, इस दिन प्रात:काल स्नान-ध्यान से निवृत हो भगवान का स्मरण करते हुए भक्त व्रत एवं उपवास का पालन करते हुए भगवान का भजन व पूजन करते हैं।

2. नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद अपने ईष्ट देव या जिसका भी पूजन कर रहे हैं उन देव या भगवान की मूर्ति या चि‍त्र को लाल या पीला कपड़ा बिछाकर लकड़ी के पाट पर रखें। मूर्ति को स्नान कराएं और यदि चित्र है तो उसे अच्छे से साफ करें।
3. पूजन में देवताओं के सामने धूप, दीप अवश्य जलाना चाहिए। देवताओं के लिए जलाए गए दीपक को स्वयं कभी नहीं बुझाना चाहिए।

4. फिर देवताओं के मस्तक पर हलदी कुंकू, चंदन और चावल लगाएं। फिर उन्हें हार और फूल चढ़ाएं। फिर उनकी आरती उतारें। पूजन में अनामिका अंगुली (छोटी उंगली के पास वाली यानी रिंग फिंगर) से गंध (चंदन, कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेहंदी) लगाना चाहिए।

5. पूजा करने के बाद प्रसाद या नैवेद्य (भोग) चढ़ाएं। ध्यान रखें कि नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नैवेद्य में नहीं किया जाता है। प्रत्येक पकवान पर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है।
6.अंत में आरती करें। जिस भी देवी या देवता के तीज त्योहार पर या नित्य उनकी पूजा की जा रही है तो अंत में उनकी आरती करने नैवेद्य चढ़ाकर पूजा का समापन किया जाता है।

7. घर में या मंदिर में जब भी कोई विशेष पूजा करें तो अपने इष्टदेव के साथ ही स्वस्तिक, कलश, नवग्रह देवता, पंच लोकपाल, षोडश मातृका, सप्त मातृका का पूजन भी किया जाता। लेकिन विस्तृत पूजा तो पंडित ही करता है अत: आप ऑनलाइन भी किसी पंडित की मदद से विशेष पूजा कर सकते हैं। विशेष पूजन पंडित की मदद से ही करवाने चाहिए, ताकि पूजा विधिवत हो सके।
पूजा में भाव जरूरी : गीता में श्रीकृष्‍ण अर्जुन से कहते हैं कि मेरे भक्त को मेरा रूप चराचर किसी भी वस्तु में भी दिखाई देता है तो वह मन में मेरा ही ध्यान करके उसे पूजता है। मेरे रूप या अवतारों की मूर्तियां बनाकर भी पूजा की जाती है। जिन्हें इन मूर्तियों में मेरा विशाल रूप दिखाई नहीं देता वो मेरे अनादि और अनंत रूप की पूजा करते हैं। दोनों ही तरह के भक्त भक्ति के रास्ते पर चलते चलते मेरे परमधाम की ओर बढ़ते हैं। हे अर्जुन पूजा मन की साधना होती है और मन की साधना का विधि से क्या लेना देना। जैसे प्रेम करने वाले दो प्रेमी मन से मन को लगाकर प्रेम करते हैं, वैसे ही भक्ति की जाती है। ये विधियां तो बनाने वालों ने बना दी हैं। मैं उन विधियों द्वारा पूजा करने वाले की पूजा भी स्वीकार कर लेता हूं परंतु मैं ये नहीं देखता कि मेरा भक्त विधि अनुसार पूजा कर रहा है कि नहीं। केवल पूजा करने वाले की भावना देखता हूं। उसके मन में मेरे प्रति प्रेम और भक्ति भाव हे या नहीं, ये देखता हूं। जिस पूजा में विधि ही विधि हो और प्रेम तथा भक्ति ना हो, उस पूजा द्वारा कोई भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। मुझे संपूर्ण साधने की एक ही विधि है मुझमें मन लगाएं, मुझमें ध्यान लगाएं।
पूजन के उपचार : (1) पांच उपचार, (2) दस उपचार, (3) सोलह उपचार। (1) पांच उपचार : गंध, पुष्प, धूप, दीप और नेवैद्य। (2) दस उपचार : पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र निवेदन, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नेवैद्य। (3) सोलह उपचार : पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नेवैद्य, आचमन, ताम्बुल, स्तवपाठ, तर्पण और नमस्कार। पूजन के अंत में सांगता सिद्धि के लिए दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए।

पंचदेव पूजा : प्रत्येक देवता का अपना मंत्र होता है जिसके द्वारा उनका आह्वान किया जाता है। जिस भी देवता का पूजन किया जाता है उससे पूर्व पंचदेवों का पूजन किया जाना जरूरी है। स्नानादि कराने के बाद देवताओं को पत्र, पुष्प, धूप आदि अर्पित किए जाते हैं। प्रत्येक चीज अर्पित किए जाने के समय प्रत्येक का वैदिक मंत्र निर्धारित है।

आदित्यं गणनाथं च देवी रुद्रं च केशवम्‌।

पंच दैवत्यामि त्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत॥

अर्थ : सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु- ये पंचदेव कहे गए हैं। इनकी पूजा सभी कार्यों में करना चाहिए।
घर में पूजा करने के नियम : घर के ईशान कोण में ही पूजा करें। पूजा के समय हमारा मुंह ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए। पूजा कर उचित मुहूर्त देखें या दोपहर 12 से शाम 4, रात्रि 12 से प्रात: 3 बजे के बीच का समय छोड़कर पूजा करें। पूजन के समय पंचदेव की स्थापना जरूर करें। सूर्यदेव, श्रीगणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु को पंचदेव कहा गया है। पूजा के समय सभी एकत्रित होकर पूजा करें। पूजा के दौरान किसी भी प्रकार शोर न करें।

घर में पूजा हेतु क्या क्या होना चाहिए :

गृहे लिंगद्वयं नाच्यं गणेशत्रितयं तथा।

शंखद्वयं तथा सूर्यो नार्च्यो शक्तित्रयं तथा॥

द्वे चक्रे द्वारकायास्तु शालग्राम शिलाद्वयम्‌।

तेषां तु पुजनेनैव उद्वेगं प्राप्नुयाद् गृही॥

अर्थ- घर में दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूर्य, तीन दुर्गा मूर्ति, दो गोमती चक्र और दो शालिग्राम की पूजा करने से गृहस्थ मनुष्य को अशांति होती है।

एका मूर्तिर्न सम्पूज्या गृहिणा स्केटमिच्छता।

अनेक मुर्ति संपन्नाः सर्वान्‌ कामानवाप्नुयात॥

अर्थ : कल्याण चाहने वाले गृहस्थ एक मूर्ति की पूजा न करें, किंतु अनेक देवमूर्ति की पूजा करे, इससे कामना पूरी होती है।
पूजा सामग्री : पूजा या हवन के लिए सबसे पहले पूजा सामग्री जुटाएं। जैसे- हवन कुंड, काष्ठ, समिधा नवग्रह की नौ समिधा (आक, ढाक, कत्था, चिरचिटा, पीपल, गूलर, जांड, दूब, कुशा) और घी आम या ढाक की सूखी लकड़ी, कूष्माण्ड (पेठा), 15 पान, 15 सुपारी, लौंग 15 जोड़े, छोटी इलायची 15, कमल गट्ठे 15, जायफल 2, मैनफल 2, पीली सरसों, पंच मेवा, सिन्दूर, उड़द मोटा, शहद 50 ग्राम, ऋतु फल 5, केले, नारियल 1, गोला 2, गूगल 10 ग्राम, लाल कपड़ा, चुन्नी, गिलोय, सराईं 5, आम के पत्ते, सरसों का तेल, कपूर, पंचरंग, केसर, लाल चंदन, सफेद चंदन, सितावर, कत्था, भोजपत्र, काली मिर्च, मिश्री, अनारदाना। चावल 1.5 किलो, घी एक किलो, जौ 1.5 किलो, तिल 2 किलो, बूरा तथा सामग्री श्रद्धा के अनुसार। अगर, तगर, नागर मोथा, बालछड़, छाड़छबीला, कपूर कचरी, भोजपत्र, इन्द जौ, सितावर, सफेद चन्दन बराबर मात्रा में थोड़ ही सामग्री में मिलावें।

उपरोक्त में से जितना एकत्रित हो सके ठीक है। नहीं हो सके तो हल्दी, कुंकू, चंदन, चावल, तुलसी, दूध, प्रसाद, अगरबत्ती, पांच फल, मिठाई, दीपक, घी, फूल, माला और लाल कपड़ा ही पर्याप्त है। इसके अलावा गंगाजल, शंख, गरुड़ घंटी, शालिग्राम, शिवलिंग और पीतल की गणेश मूर्ति भी रखें। गंगाजल, तुलसी के पत्ते, बिल्वपत्र और कमल, ये चारों किसी भी अवस्था में बासी नहीं माने जाते हैं। इसलिए इनका उपयोग पूजन में कभी भी किया जा सकता है।