एक व्यक्ति ने कहा, 'सर्दी लग रही है। ठिठुर रहा हूं।' दूसरे ने कहा, 'जाओ, कपड़ा ओढ़ लो।' वह घर में गया और मलमल की चादर ओढ़ आया। आकर बोला, 'कपड़ा ओढ़ लिया, फिर भी ठंड लग रही है।' उसने कहा, 'भले आदमी! मैंने कपड़ा ओढ़ने के लिए कहा था। इस ठिठुरन से बचने के लिए कैसा कपड़ा ओढ़ना है, यह विवेक तो तुम्हें होना ही चाहिए। मलमल से ठंड नहीं रूकती। वह रूकती है मोटे कपड़े से, ऊनी कपड़े से। जब तक मोटा कपड़ा या ऊनी कपड़ा नहीं ओढ़ा जाएगा, ठंड रूकेगी नहीं।' कहने का अर्थ है कि यही बात देखने के विषय में है। देखना भी चल रहा है और विचार भी चल रहा है, यह नहीं होना चाहिए। देखने में केवल देखना ही चले। यह तभी संभव है जब देखना सघन हो। ठंड का रूकना तभी संभव है जब मोटा कपड़ा ओढ़ा जाए।  
प्रश्न होता है कि किसे देखें? क्या देखें? अच्छा-बुरा जो भी आए उसे देखें। प्रोध आए तो उसे भी देखो। मान आए तो उसे भी देखो। वास्तव में जो प्रोध को देखता है, वही मान को देखता है। प्रोध हमारी सबसे स्थूल वृत्ति है। यह सबके समक्ष प्रत्यक्ष होती है। मान छिपा रहता है। प्रकट कम होता है। प्रोध तत्काल प्रकट हो जाता है। प्रोध का परिणाम -दुख को देखो। सुख को भी देखो। सुख के स्पंदनों को देखो। दुख के स्पंदनों को देखो। जो भी अच्छा या बुरा है, उसे देखो। श्वास को देखो। शरीर को देखो। समत्व को देखो। तटस्थता को देखो। अनन्यदर्शी को देखो। उसको देखो जहां दूसरा कोई नहीं है। चेतना के उस शुद्ध स्वभाव को देखो जहां जानने-देखने के सिवाय कुछ भी नहीं है। वही परम दर्शन है।