नई दिल्ली । नई शिक्षा नीति को जमीन पर उतारने की तैयारी शुरू हो गई है। नई नीति से मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में क्या आमूलचूल बदलाव आएंगे इसमें शिक्षा मंत्री ने बताया कि नई नीति से कैसे बेरोजगारी में कमी आएगी और किस तरह से शिक्षा के स्तर में सुधार होगा। पढ़ें, साक्षात्कार के प्रमुख अंश इस नीति से शिक्षा में बड़ा बदलाव आने वाला है। इसमें व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास पर ज़ोर दिया गया है, जिससे विद्यार्थी पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होंगे। प्रत्येक विद्यार्थी को नौकरी व स्वरोजगार के लिए पूर्ण प्रशिक्षण देने का भी प्रावधान है। इससे आने वाले समय में देश से बेरोज़गारी खत्म होगी। ईसीसीई शिक्षकों का शुरुआती कैडर तैयार करने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और शिक्षकों को एनसीईआरटी द्वारा विकसित पाठ्यक्रम के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन्हें 6 माह का सर्टिफिकेट कोर्स और एक साल का डिप्लोमा कराया जाएगा। ईसीसीई पाठ्यक्रम और शिक्षण विधि की जिम्मेदारी शिक्षा मंत्रालय की होगी। महिला और बाल विकास, स्वास्थ्य तथा जनजातीय कार्य मंत्रालय सहयोग करेंगे। जहां तक संभव हो कम से कम ग्रेड-5 तक शिक्षा का माध्यम घर की भाषा, मातृ भाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा होगी। इसके बाद स्थानीय भाषा को जहां तक संभव हो भाषा के रूप में पढ़ाया जाता रहेगा। सार्वजनिक एवं निजी स्कूल इसका अनुपालन करेंगे। किसी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। आरम्भिक बाल्यावस्था देखभाल यानी तीन वर्ष की आयु से लेकर उच्चतर माध्यमिक शिक्षा अर्थात ग्रेड-12 तक शिक्षा नि:शुल्क एवं अनिवार्य होगी। बोर्ड और प्रवेश परीक्षा सहित माध्यमिक स्कूल परीक्षाओं की वर्तमान प्रकृति के कारण कोचिंग संस्कृति पनप गई है। इनके चलते विद्यार्थी अपना कीमती समय परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग में बर्बाद कर रहे। बोर्ड परीक्षाओं को आसान बनाया जाएगा। उनके उच्चतर जोखिम पहलू को समाप्त करने के लिए छात्रों को स्कूल वर्ष के दौरान दो बार बोर्ड परीक्षा देने की अनुमति दी जाएगी। एक मुख्य परीक्षा और यदि आवश्यक हो तो सुधार के लिए एक और परीक्षा की अनुमति मिलेगी। उच्चतर प्रदर्शन करने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों को अन्य देशों में परिसर स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसी तरह दुनिया के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों को भारत में संचालन की अनुमति दी जाएगी। इसके लिए एक वैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जाएगा। एक बात और विदेशी विश्वविद्यालयों में अर्जित किए गए क्रेडिट देश में मान्य होंगे और यदि वह उच्चतर शिक्षण संस्थान की आवश्यकताओं के अनुसार हैं तो इन्हें डिग्री प्रदान करने के लिए भी स्वीकार किया जाएगा।
स्नातक उपाधि तीन या चार वर्ष की अवधि के होंगे, जिसमें उपयुक्त प्रमाण पत्र के साथ निकास के नए विकल्प होंगे। जैसे, एक साल पूरा करने पर सर्टिफिकेट, दो साल पूरा करने पर डिप्लोमा या तीन साल पूर्ण करने पर स्नातक की डिग्री दी जाएगी। चार वर्षीय स्नातक प्रोग्राम में बहु विषयक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा। संस्थानों को उनके प्रमाणन के आधार पर फीस की एक उच्चतर सीमा तय करने के लिए पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाएगा। निजी उच्चतर शिक्षण संस्थानों द्वारा निर्धारित सभी फीस और शुल्क पारदर्शी रूप से बताए जाएंगे और किसी भी छात्र के नामांकन के दौरान फीस शुल्क में कोई मनमानी वृद्धि नहीं होगी। शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी के छह फीसदी किया जाएगा। केंद्र एवं राज्यों द्वारा शिक्षा पर ज्यादा निवेश से संसाधन बढ़ेंगे। इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा।