डिजिटल मीडिया पर नए तरह के रेवेन्यु (आमदनी) मॉडल बनाने को लेकर पिछले कुछ सालों से जद्दोजहद चल रही है, उस दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। श्रव्य-दृश्य और मनोरंजन के लिए तो यूट्यूब का अपना तरीका है लेकिन प्रिंट के लिए नहीं था।

श्रमजीवी पत्रकार और समाचार पत्र मेहनत और संसाधनों को लगाने के बाद किसी खबर को तैयार कर पाते हैं। लिखी जाने वाली खबर के पीछे समय, अनुभव और अनेकों संसाधनों की कीमत लगी हुई होती है। 

जिस तरह से डिजिटल मीडिया के अनेकों प्लेटफार्म और बहुराष्ट्रीय कंपनियां (जिनकी आमदनी कई देशों के सालाना बजट से भी ज्यादा है) इन खबरों का दोहन बिना उसकी कीमत चुकाए अपने व्यापार के प्रसार में कर रहीं थी उसका ऑस्ट्रेलिया के कुछ अखबारों ने विधिवत विरोध किया था। तब से  ही गूगल पर दबाव बनना चालू हो गया था की वह फ्री में दूसरों के प्रोडक्ट को अपनी दुकान पर न सजाये। 

अच्छी बात यह है कि गूगल अब अपनी आमदनी से कुछ पैसा अखबारों को भी देगा । जो खबरों को पहली बार प्रकाशित करते हैं ।

अभी यह प्रयोग के स्तर पर है, क्योंकि गूगल ने इसके लिए जर्मनी के "द स्पीगल", ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील के कुछ अखबारों के लिए चुना है।

आशा करते हैं आने वाले समय में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां जब हम जैसे पत्रकारों और समाचार पत्रों का कंटेंट अपने प्लेटफार्म पर डालेंगी तो उसके उसका रेवेन्यू शेयरिंग ज़रूर करेंगी।

यह नए ट्रेंड की शुरुआत है। इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। अभी गूगल है... शायद फेसबुक भी ऐसा ही कुछ आगे करे।


डॉ. नवीन आनन्द जोशी