कई बीमारियों से जूझने वाले अरुण जेटली ने अगस्त 2019 में ही दुनिया को अलविदा कह दिया था। अरुण जेटली वह शख्स थे जिनकी पीएम मोदी से करीबी किसी से छिपी नहीं थी। माना जाता है कि अरुण जेटली के साथ पीएम मोदी की करीबी काफी पुरानी थी। यह दोस्ती तब और बढ़ी जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और केंद्रीय नेतृत्व उन्हें इस पद से हटाने पर विचार कर रहा था लेकिन उस समय अरुण जेटली मोदी के लिए संकटमोचक बने और मोदी की कुर्सी बच गई। माना जाता है कि वह अरुण जेटली ही थे जो नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में लाए। 

नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के तीन महीने बाद ही साल 2002 में गुजरात के दंगे हुए थे। दंगों को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ही नरेंद्र मोदी को 'राजधर्म' का पालन करने की सलाह दे दी थी, जिसके बाद यह अटकलें लगाई जाने लगीं कि वाजपेयी दंगों से निपटने के गुजरात सरकार के तरीकों से नाखुश थे।

जो आडवाणी कर सके, वह जेटली ने कर दिखाया

माना जाता है कि उस समय वाजपेयी नरेंद्र मोदी को सीएम पद से हटाने पर अड़े हुए थे। हालांकि, उस समय सरकार और बीजेपी में नंबर 2 माने जाने वाले एलके आडवाणी इस फैसले से सहमत नहीं थे लेकिन वह वाजपेयी के विरुद्ध भी जाने को तैयार नहीं थे। ऐसी स्थिति में वह अरुण जेटली ही थे जिन्होंने वाजपेयी से कहा था कि नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने पर पार्टी को ज्यादा नुकसान होगा और वाजपेयी इसपर राजी हो गए थे।

 गुजरात चुनाव में 'ब्रैंड मोदी' की शुरुआत

इसके साथ ही मोदी और जेटली की पार्टनरशिप शुरू हो गई और यह पूर्व केंद्रीय मंत्री के निधन तक चलती रही। साल 2007 के गुजरात चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती से भरे माने जा रहे थे। उस समय अरुण जेटली उनकी मदद के लिए चुनावी रणनीति के साथ अहमदाबाद पहुंचे। इस चुनाव से ही ब्रैंड मोदी की शुरुआत हुई। नरेंद्र मोदी को गुजरात की जनता के सामने हिंदुत्व के ऐसे पोस्टर बॉय के रूप में पेश किया गया, जिसका लक्ष्य विकास है। 

नई दिल्ली की राजनीति में भी अरुण जेटली ने नरेंद्र मोदी की विकासप्रिय शख्स की छवि को बनाए रखना जारी रखा। साल 2009 में जब एलके आडवाणी लोकसभा चुनावों में बीजेपी को जीताने में विफल रहे तब बीजेपी को अगली पीढ़ी के नेता की तलाश थी। उस समय अरुण जेटली ने ही नरेंद्र मोदी को आगे करने में अहम भूमिका निभाई। 

 साल 2009 के बाद राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी बीजेपी नेतृत्व के चेहरे के तौर पर रेस में सबसे आगे थे। लेकिन जेटली यह जानते थे कि पार्टी में सुप्रीम लीडर के तौर पर एलके आडवाणी की जगह सिर्फ नरेंद्र मोदी ही ले सकते हैं। 

पार्टी के नेताओं को एकजुट करने के लिए पर्दे के पीछे किया काम

इसके बाद जेटली ने पर्दे के पीछे रहकर राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और वेंकैया नायडू जैसे दिग्गजों को एकजुट करने का काम किया ताकि 2014 लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के चेहरे पर एकमत हो। उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी पीएम पद के लिए कई नेताओं की पहली पसंद थे। लेकिन अरुण जेटली वह नेता रहे जिन्होंने पार्टी के साथ ही राष्ट्र स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस को भी यह यकीन दिलाया कि नरेंद्र मोदी की टक्कर में कोई नहीं है।

मोदी के मीडिया के साथ अच्छे रिश्ते होने पर अरुण जेटली ने ही साल 2014 में अपनी रणनीति से ब्रैंड मोदी को घर-घर पहुंचाया। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुने जाने पर लिखित में विरोध दर्ज करने वाली सुषमा स्वराज को भी अरुण जेटली ने बीजेपी की अभूतपूर्व जीत के बाद अपने साथ कर लिया और बाद में सुषमा ने पीएम मोदी के साथ विदेश मंत्री के तौर पर भी काम किया।