आदमी बीमार हो गया। रक्त चढ़ाने की जरूरत हुई। डॉक्टर रक्त चढ़ाता है, तो पहले वह ग्रुप मिलाता है। किस ग्रुप का रक्त है? ठीक मिलेगा या नहीं? सेठ को रक्त चढ़ाना था- एक कंजूस आदमी का रक्त ठीक मिला, चढ़ाया गया। सेठ को पता चला कि उसको कंजूस का रक्त चढ़ाया जा रहा है। सेठ बड़ा उदार था। अपने मुनीम को कहा, 'उसको तीन हजार रूपए दे दो।' भाग्य की बात, दूसरी बार फिर खून चढ़ाने की जरूरत हुई। उसी कंजूस का रक्त। सेठ ने कहा, 'उसे सौ रूपए दे दो।' तीसरी बार जरूरत हुई तो सेठ ने एक कागज लिया और उस पर लिखा साधुवाद, धन्यवाद!  
ऐसा क्यों हुआ? सेठ तो उदार था, किन्तु जिसका रक्त चढ़ाया जा रहा था, वह कंजूस था। उसका इतना प्रभाव हुआ कि जब तक रक्त का पूरा प्रभाव नहीं हुआ तो तीन हजार रूपए दिए, थोड़ा प्रभाव हुआ तो सौ रूपए और पूरा प्रभाव हुआ त़ो धन्यवाद दिया।  
कहने का अर्थ यह कि चाहे रक्त हो, चाहे कोई दूसरी वस्तु हो, हमारे शरीर में बाहर के जो परमाणु प्रवेश पाते हैं, वे परमाणु जिस प्रकार के होते हैं, अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रहते। इसलिए यह विषय हमारे लिए इतना महत्व का है कि बाहर से क्या आ रहा है, हम पूरा विवेक करें, पूरी छानबीन करें, तब ही  किसी बात को स्वीकार करें। हम इस बात को अस्वीकार नहीं करेंगे कि भोजन के परमाणुओं में अनेक तत्व विद्यमान होते हैं, अनेक संस्कार मिले होते हैं। उन संस्कारों का असर हमारे जीवन के दैनिक क्रियाकलापों पर पड़ता है। इससे हम अछूते नहीं रह सकते।