राजा सैर पर जब महल से निकला, तो द्वार पर मुस्कुराते हुए एक दरबान पर नजर पडी। जब सैर करके लौटा, तब भी दरबान मुस्कुरा रहा था। बादशाह सोचने लगा ‘मैं’ राजा होते हुए भी इतना नहीं मुस्कुराता! राजा ने मंत्री से कहा कि ऐसा उपाय करो कि महल के सभी कर्मचारी हमेशा मुस्कुराएं। मंत्र बोला- बड़ा मुश्किल है, क्योंकि हम मुस्कुराना नहीं, दुखी करना जानते हैं, तनख्वाह कम कर सकते हैं, डांट सकते हैं, नौकरी से निकाल सकते हैं, पर दुखी व्यक्ति को खुश नहीं कर सकते।
राजा बोले- यदि दुखी कर सकते हो, तो उस दरबान को दुखी करके दिखाओ, मंत्री बोला- ठीक है। मंत्री ने राजा से कहा- आप ऐलान कर दीजिए कि इस दरबान को इनाम दिया जाएगा। दरबान को सभा में बुलाया गया। दरबान को कपड़ा ढंके एक परात राजा ने इनाम में दी। मंत्री बोला- यह तोहफा कल सुबह खोलना। रातभर तोहफा तुम्हारे घर के बाहर आठ पहरेदारों की निगरानी में रहेगा।
रात भर वह दरबान बिना सोए, सुबह होने के इंतजार में बैठा रहा। सुबह होने पर दरबान ने तोहफा खोला, तो उसमें सोने की अशर्फियां थी, दरबान ने खुशी में अशर्फियां गिनी तो वो निन्यानवे थी, बार-बार गिनने पर भी निन्यानवे ही निकली। दरबान सोचने लगा बादशाह ने तो सौ ही दी होंगी, शायद किसी ने एक अशर्फी निकाल ली। हो सकता है रात के पहरेदारों में से किसी ने चुरा ली हो। अब निन्यानवे अशर्फियां मिलने की खुशी नहीं, बल्कि एक अशर्फी के कम होने का गम सताने लगा।
दरबान सुबह जब पहरेदारी करने महल आया, तब उसका चेहरा उदास था, चेहरे की हंसी उड़ चुकी थी, अब वो निन्यानवे अशर्फी का मालिक होते हुए भी दुखी हो चुका था। जीवन में जितना मिला है यदि उसकी खुशी नहीं मनाएंगे, तो मन कुछ और की तलाश में दुखी कर देगा। असंतोष का भाव दुःख और संतोष का भाव सुख देता है। यदि जीवन में सुख चाहिए, तो संतोष में आ जाओ।