आजकल युवा महिलाओं में भी स्तन कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं। कई बार इसका पता देर में चलता है जिससे वह लाइलाज हो जाता है पर 3डी मैमोग्राफी युवा महिलाओं में स्तन कैंसर को पकड़ने में कारगर नजर आ रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार 'स्तन कैंसर के कारणों का हालांकि अभी पता नहीं लग पाया है, लेकिन यह तय है कि जितनी जल्दी इसका पता लगाया जाता है, ठीक होने के अवसर उतने ही बढ़ जाते हैं।
परंपरागत तौर पर मैमोग्राफी 2 डायमेंशनल ही होती है, जो ब्लैक एंड व्हाइट एक्सरे फिल्म पर परिणाम देती है।इसके साथ ही इन्हें कंप्यूटर स्क्रीन पर भी देखा जा सकता है। वहीं 3डी मैमोग्राम में ब्रेस्ट की कई तस्वीरें विभिन्न एंगलों से ली जाती हैं, ताकि एक स्पष्ट और अधिक आयाम की छवि तैयार की जा सके।
इस तरह के मैमोग्राम की जरूरत इसलिए है, क्योंकि युवावस्था में युवतियों के स्तन के ऊतक काफी घने होते हैं और सामान्य मैमोग्राम में कैंसर की गठान का पता नहीं लग पाता है। 3डी मैमोग्राम से तैयार किए गए चित्र में स्तन के टिश्यू के बीच छिपी कैंसर की गठान को भी पकड़ा जा सकता है।
3डी मैमोग्राम के और कई फायदे हैं, जैसे कि ब्रेस्ट कैंसर की गठान का जल्द से जल्द पता लगाकर उसका इलाज करना ही मैमोग्राम का मुख्य उद्देश्य है। इसके लिए 3डी इमेजिंग को काफी कारगर माना जाता है।
3डी मैमोग्राम की तस्वीरों और सीटी स्कैनिंग में काफी समानता है और इसमें मरीज को परंपरागत मैमोग्राफी की तुलना में काफी कम मात्रा में रेडिएशन का सामना करना पड़ता है।
40 से अधिक उम्र वाली महिलाएं करायें मैमोग्राफी
चालीस साल की उम्र के आसपास पहुंच रहीं महिलाओं को हर साल मैमोग्राफी करने की सलाह दी जाती रही है लेकिन अब उन्हें 3-डी इमेजिंग तकनीक का सहारा लेना चाहिए। इस तकनीक का फायदा हर उम्र की महिलाओं को मिल सकता है, लेकिन युवावस्था में कैंसर की गठान यदि पकड़ में आ जाती है तो उसका कारगर इलाज करके जान बचाई जी सकती है।
इसलिए होती है खास 3डी तकनीक
दरअसल, 3डी मैमोग्राफी करने का तरीका बिल्कुल 2डी मैमोग्राफी की ही तरह होता है। इसमें महिला के स्तन को एक्सरे प्लेट और ट्यूबहेड के बीच रखकर कई एंगल से अनेक तस्वीरें ली जाती हैं। इस तरह की तस्वीरों को स्लाइसेस कहा जाता है। इतने बारीक अंतर से स्तन के फोटो स्लाइसेस बनाए जाते हैं कि छोटी से छोटी कैंसर की गठान भी दिखाई देने लगती है।