नई दिल्ली ,सोनिया गांधी के नाम सबसे ज्यादा समय तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहने का रिकॉर्ड है. 20वीं सदी के आखिरी सालों में पतन के गर्त में जाती दिख रही कांग्रेस में दोबारा जान फूंककर उसे लगातार 10 साल तक देश की सत्ता में बैठाने का श्रेय उन्हें जाता है. भारतीय राजनीति की सफलतम बहू सोनिया गांधी का आज जन्मदिन है. उन्होंने अपने जीवन के 73 साल का सफर ऐसे समय पर पूरा किया है, जब उनकी पार्टी अपने सबसे कमजोर मुकाम पर खड़ी है. कांग्रेस का जनाधार लगातार सिमटता जा रहा है और संगठन बिखरा सा नजर आ रहा है. ऐसे में 'गांधी परिवार' के साथ-साथ कांग्रेस के नए वारिस की सोनिया गांधी की तलाश पूरी नहीं हो रही है. 

सोनिया गांधी का सफल सियासी सफर 
सोनिया करीब दो दशकों से कांग्रेस अध्यक्ष की कमान संभाले हुए हैं. कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर पहले कार्यकाल में सोनिया ने 19 साल तक पार्टी की बागडोर संभाली. राहुल गांधी के पद छोड़ने के बाद एक साल से सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर काम देख रही हैं. पहली पारी में सोनिया ने जहां पार्टी को करिश्माई नेतृत्व दिया, वहीं दूसरी पारी में वो नाइट वॉचमैन की भूमिका में ज्यादा नजर आईं.  

सोनिया ने 22 साल पहले जब पद संभाला तब देश की सियासत में अटल बिहारी वाजपेयी-लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी तूफान मचाए हुई थी. थर्ड फ्रंट की राजनीति भी अपने सियासी उफान पर थी. क्षत्रपों के आगे कांग्रेस बेबस नजर आ रही थी. ऐसी हालत में सोनिया गांधी ने नेतृत्व संभालकर कांग्रेस को नई संजीवनी दी और उसे फिर से राजनीति के शीर्ष पर पहुंचाया. 

सोनिया 1998 से 2017 तक पार्टी की अध्यक्ष रहीं. 2004 में उन्होंने पार्टी के चुनाव प्रचार का नेतृत्व किया. ये उन्हीं का करिश्मा था कि अटल बिहारी वाजपेयी की छह साल की उपलब्धियां और शाइनिंग इंडिया, फील गुड का नारा धूमिल पड़ गया. कांग्रेस ने धमाकेदार वापसी कर केंद्र में सरकार बनाई. सोनिया ने तब खुद प्रधानमंत्री बनने से इनकार करते हुए इस पद पर मनमोहन सिंह की ताजपोशी का फैसला किया, जिसे आज भी कई सियासी जानकार राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक मानते हैं.

सियासत में नहीं आना चाहती थीं सोनिया गांधी
हालांकि, 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी राजनीति में आने को तैयार नहीं थीं. सियासत में उनकी भागीदारी धीरे-धीरे शुरू हुई. पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे प्रणब मुखर्जी अपने संस्मरण में लिखते हैं कि सोनिया को कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय करने के लिए पार्टी के कई नेता मनाने में लगे थे. उन्हें समझाने की कोशिश की जा रही थी कि उनके बगैर कांग्रेस खेमों में बंटती जाएगी और भारतीय जनता पार्टी का विस्तार होता जाएगा. 

वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर कहते हैं कि सोनिया कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार 1997 में गईं. उन्होंने पद लेने के बजाए पार्टी के लिए प्रचार से अपना राजनीतिक करियर शुरू किया. 1998 में कांग्रेस की कमान संभालने के बाद पार्टी को मजबूत किया. वो न तो बहुत ही अच्छे से हिंदी बोलती थीं और न ही राजनीति के दांवपेच से बहुत ज्यादा वाकिफ थीं. इसके बाद भी पार्टी पर उनकी पकड़ काबिले तारीफ थी. सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस 1999 का लोकसभा चुनाव लड़ी. लेकिन उसे मुंह की खानी पड़ी. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वाजपेयी की अगुवाई वाली बीजेपी को उस चुनाव में करगिल युद्ध और पोखरण परमाणु विस्फोट का राजनीतिक लाभ मिला.

2004 के लोकसभा चुनाव में दिखाया असर
शकील अख्तर कहते हैं कि 2004 के लोकसभा चुनावों की तैयारियों के वक्त बतौर अध्यक्ष सोनिया गांधी की सूझबूझ और सियासी समझ सबसे प्रमुखता के साथ दिखी. सोनिया गांधी ने सत्ताधारी बीजेपी के मुकाबले के लिए एक प्रभावी गठबंधन तैयार किया. वे कांग्रेस से मिलती-जुलती विचारधारा वाले ऐसे दलों को कांग्रेस के साथ लाने में सफल रहीं, जिनकी राजनीति ही कांग्रेस के विरोध में खड़ी हुई थी. इसका नतीजा यह हुआ कि केंद्र की सरकार में कांग्रेस की वापसी हो गई.

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने, लेकिन सोनिया ने यूपीए की प्रमुख के तौर पर सरकार चलाने के राजनीतिक पक्ष को देखा. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष के तौर पर सरकार के नीतिगत पक्ष को भी उन्होंने प्रभावित किया. नीतियां बनाने के मामले में अधिकार आधारित नीतियों को प्रमुखता दिए जाने को सोनिया गांधी का योगदान माना जा सकता है. कांग्रेस के 10 साल के कार्यकाल में सूचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार, वन अधिकार, भोजन का अधिकार और उचित मुआवजे और पुनर्वास का अधिकार संबंधित कानून सरकार ने बनाए.