इन्दौर । क्रोध एक ऐसी आग है जो पहले स्वयं को जलाती है, बाद में दूसरों को। क्रोध ने कई बड़े नुकसान किए हैं, लेकिन उसके नतीजों से हमने कुछ भी नहीं सीखा। कारण कितना ही सही हो, परिणाम अच्छा नहीं होता। घर के सदस्यों के बीच क्रोध रहने से हम लड़ाई भले ही जीत जाएं, रिश्तें हार जाते हैं। क्रोध सबसे पहले हमारे सुंदर चेहरे को विकृत बनाता है, हमारे भविष्य को बिगाड़ता है, हमारी प्रसन्नता को नष्ट करता है और हमारे नेचर अर्थात स्वभाव को भी प्रभावित करता है। इस प्रवचनमाला की सार्थकता यही होगी कि आज के बाद आप सब लोग यह संकल्प करें कि घर से क्रोध करके बाहर नहीं निकलेंगे, घर में क्रोध करने के बाद प्रवेश नहीं करें, भोजन करते वक्त भी क्रोध नहीं करें, अपने उपकारी अर्थात माता-पिता, भाई-बहन, गुरू और मित्र के साथ भी क्रोध नहीं करें। धर्मस्थान पर भी क्रोध नहीं करें, सोने के लिए जाए, तब भी क्रोध न करें और सबसे महत्वपूर्ण - मोबाईल पर बात करते वक्त भी क्रोध न करें।       
दशहरा मैदान पर चल रही परिवर्तन प्रवचनमाला के तीसरे दिन उपस्थित सुधी श्रोताओं की महती धर्मसभा को ‘आक्रोश के आतंक से आजादी‘ विषय पर संबोधित करते हुए पद्मभूषण जैनाचार्य प.पू. रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. ने उक्त संदेश दिए और उपस्थित हजारों भक्तों को यह संकल्प भी दिलाया कि वे अब जीवन में कभी क्रोध नहीं करेंगे। यदि जीवनभर संभव न हो तो इस प्रवचनमाला के चलने अर्थात 2 जून तक किसी भी स्थिति में क्रोध नहीं करेंगे और हर हाल में अपने परिवार को क्रोध के आतंक से बचाएंगे। श्रोताओं ने दोनों हाथ उठा कर इस संकल्प पर अपनी सहमति व्यक्त की। आज भी दशहरा मैदान स्थित प्रवचन स्थल का पांडाल सभी धर्मों के नागरिकों  से लबालब बना रहा। प्रारंभ में रूपेश शाह द्वारा गुरू वंदना के बाद दिलीप राजपाल, मनोज गंगवाल, अशोक काला, अरविंद चैरड़िया, किशोर गोयल आदि ने दीप प्रज्वलन कर शुभारंभ किया। सिख समाज के संत सरदार राजेंदर सिंह बाबाजी सहित अनेक धर्मों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में उपस्थित थे। आयोजन समिति की ओर से मुकेश गांग, संजय कटारिया, दिनेश डोसी, आकाश गांग, मुकुंदचंद मेहता, यश चैपड़ा आदि ने सभी संतो एवं अतिथियों की अगवानी की। आज मंच पर ऐसे लोगों का आचार्यश्री ने सम्मान भी किया, जिनका आज जन्मदिन था। यह क्रम प्रतिदिन जारी रहेगा। संचालन कांतिलाल बम ने किया। बुधवार 29 मई को सुबह 8.45 से 10.15 बजे तक आचार्यश्री‘ प्यार ही है परिवार का आधार‘ जैसे सामयिक विषय पर अपने प्रेरक विचार रखेंगे। 
आचार्यश्री ने कहा कि क्रोध करना भी हो तो मां और गुरू जैसा करना चाहिए जिसमें अपने बच्चे या शिष्य के प्रति कल्याण का भाव रहता है। मां जब बेटे या बेटी का जीवन बचाने के लिए थप्पड़ मारती है तो जितनी पीड़ा बच्चे को नहीं होती, निश्चित ही उससे कहीं ज्यादा पीड़ा मां को होती है। यहीं स्थिति गुरू की भी होती है। अच्छे काम के लिए किया गया क्रोध लगता तो क्रोध है पर होता नहीं है। बागवान अपने बगीचे को बड़ी मेहनत से हरा भरा और सुंदर बनाने के लिए कई जतन करता है। मां- बाप और गुरू भी अपने प्रिय लोगों को संस्कारी और समृद्ध बनाने के लिए ही क्रोध करते हैं। क्रोध के तीन कारण होते हैं - आदत, स्वभाव और भय। हम लोग क्रोध करते हैं या क्रोध हो जाता है इस पर भी विचार करें। आने वाले दिनों में जो आनंद रहेगा या नहीं, इसके भय से क्रोध करेंगे तो वर्तमान का आनंद भी खो देंगे।  
:: क्रोध के चार बिंदु :: 
आचार्यश्री ने प्रवचन के विषय को चार भागों में विभक्त कर सबकी बिंदुवार सरल व्याख्या की। पहला बिंदु था सीवियर इफेक्ट टू फीचर अर्थात का्रेध का पहला नतीजा यह होता है कि क्रोध करने वाले की शक्ल विकृत हो जाती है। दूसरा बिंदु था साइलेंट इफेक्ट टू फ्यूचर, जिसमें उन्होने कहा कि हमारी सत्ता, संपत्ति, सौंदर्य और स्वास्थ भले ही स्थिर रहें, शरीर तो हमेशा एक जैसा नहीं रहेगा तब हमें उन लोगों की मदद लेना पड़ेगी, जिन पर  आज हम क्रोध कर रहें हैं। सोचिए कि आज अपनी शक्ति के समय में हम जिनकों दबाने का अपराध और पाप कर रहे हैं, वे हमारी अशक्ति अर्थात वृद्धावस्था में कैसी सेवा करेंगे। तीसरा बिंदु था प्लेजर याने क्रोध हमारी प्रसन्नता और खुशियों को ग्रहण लगा देता है। ऐसे हालात भी बन जाते हैं कि हम आयु बढ़ाने की नहीं, स्वयं को उठा लेने की प्रार्थना करने लगते हैं। जिन घर के लोगों के बीच जीवन भर रहना है, उनके दिल को तोड़ने का काम भी यह क्रोध ही कराता है। महावीर स्वामी ने कहा है कि उनका धर्म मरने के बाद स्वर्ग जाने का नहीं, जहां जिंदा है वहीं स्वर्ग पैदा करने का धर्म है। क्रोध हमारे ‘इगो‘ से उपजता है। हम जो चाहते हैं, वह नहीं होता इसलिए क्रेाध होता है। जो आसानी से नहीं जाए, वह इगो होता है। चैथा बिंदु था नेचर याने यदि हम क्रेाधी हैं तो कोई भी हमारे साथ आसानी से घुलनेे मिलने और बैठने के लिए तैयार नहीं होता। आग की तरह क्रोध भी पहले स्वयं को जलाता है, फिर किसी और को। जो क्रोध इन चार चार गुणों को डेमेज करता है उसके प्रति हमारा साफ्ट कार्नर कतई नहीं होना चाहिए।