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'कड़कनाथ' को रास आया छत्तीसगढ़, अब निर्यात की तैयारी

By Khabarduniya :14-11-2017 08:02


रायपुर। कड़कनाथ मुर्गा नस्ल को छत्तीसगढ़ की आबोहवा रास आ गई है। वे अब यहां आसानी से प्रजनन कर रहे हैं और इनमें दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। इंदिरा गांधी कृषि विवि के कृषि विज्ञान केन्द्रों में मुर्गों के उत्पादन के लिए चल रही मुहिम काफी सफल रही है।

इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ तीन साल पहले झाबुआ मप्र से कड़कनाथ मुर्गो के चूजे लाए गए थे और आज इनका उत्पादन इतना हो गया है कि चूजों का निर्यात भी किया जाने लगा है।

प्राकृतिक प्रजनन एवं कृत्रिम हैचिंग के माध्यम से शुरू कड़कनाथ चूजा उत्पादन योजना के तहत अब छत्तीसगढ़ से 70 हजार चूजे उत्पादित किए जा रहे हैं। इसी बात को देखते हुए और इनके उत्पादकों को अच्छा मूल्य मिल सके, इसके लिए 14 नवंबर को दंतेवाड़ा में आयोजित आदिवासी उद्यमिता सम्मेलन में एक व्यावसायिक संस्था से अनुबंध भी करने जा रही हैं, ताकि उत्पादकों को लाभ हो सकें।

सबसे ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक

सम्पूर्ण भारत में अपने काले मांस की वजह से प्रसिद्ध कड़कनाथ मुर्गा प्रजाति में अन्य कुक्कुट प्रजातियों की अपेक्षा अधिक प्रोटीन व कम वसा होने के कारण यह स्वास्थयवर्धक मानी जाती है। इसमें कोलेस्ट्राल की मात्रा भी अन्य प्रजातियों की अपेक्षा कम होती है।

कड़कनाथ के विशिष्ट गुणों के कारण बाजार में इसकी काफी मांग है और इसकी कीमत अन्य मुर्गियों की अपेक्षा काफी अधिक है। इस प्रजाति की रोग प्रतिकारक क्षमता अन्य पक्षियों की अपेक्षा अधिक होती है।

500 अंडों से 70 हजार चूजे

छत्तीसगढ़ की जलवायु में इस नस्ल को आसानी से पाला जा सकता है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए इंदिरा गांधी कृषि विवि की इकाई कृषि विज्ञान केन्द्र कांकेर में अप्रैल 2014 में झाबुआ (मध्यप्रदेश) कड़कनाथ नस्ल के चूजे ला कर प्राकृतिक प्रजनन एवं कृत्रिम हैचिंग केन्द्र प्रारंभ किया गया।

आदिवासी उपयोजना के तहत प्रारंभ में 500 अंडा क्षमता वाली कृत्रिम हैचिंग मशीन की स्थापना की गई और कड़कनाथ नस्ल के कुक्कट का प्रजनन प्रारंभ किया गया, जो अब लगभग 70 हजार चूजे उत्पादित करते हैं।

जिसे छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों- कांकेर, दंतेवाड़ा, बस्तर, नारायणपुर,बीजापुर, धमतरी, रायपुर, सरगुजा, बलरामपुर, कोरिया, कबीरधाम, राजनांदगांव एवं गरियाबंद सहित अन्य राज्यों जम्मू कश्मीर, ओड़िशा और महाराष्ट्र को भेजे जाते हैं, जिसमें दंतेवाड़ा में खनिज विकास मद से, कांकेर जिले में मनरेगा योजना के तहत और रायपुर जिले के दो किसानों एवं महासमुंद जिले का एक किसान द्वारा कृत्रिम हैचरी स्थापित कर प्रजनन एवं उत्पादन कार्य प्रारंभ किया गया है।

Source:Agency

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