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चित्रकूट में कांग्रेस का चिराग

By Khabarduniya :14-11-2017 07:07


संतकवि तुलसीदास जी से क्षमा याचना सहित ये पंक्तियां मध्यप्रदेश के चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत पर कहने का मन हो रहा है। यूं तो  किसी एक प्रदेश की एक विधानसभा सीट के उपचुनाव में किसी की जीत या हार बहुत मायने नहीं रखती है। लेकिन जब से चुनाव जीतने को ही राजनीति का परम लक्ष्य बना लिया गया है और सारे जरूरी मुद्दों को दरकिनार कर केवल जीत के लिए सारी तिकड़में लगाई जाने लगी हैं, तो उपचुनाव भी बहुत अहम हो गए हैं। चित्रकूट विधानसभा सीट पर अधिकतर वक्त कांग्रेस का कब्जा रहा है। कांग्रेस विधायक प्रेम सिंह के मई में निधन के बाद इस सीट पर उपचुनाव होने थे और भाजपा इस कांग्रेसी सीट को अपने कब्जे में लेना चाहती थी। दस्यु से नेता बने प्रेम सिंह की इस इलाके पर इतनी पकड़ थी कि वे तीन बार यहां से विधायक रहे।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कहने पर उन्होंने दस्यु जीवन छोड़ा और 1980 में कांग्रेस में प्रवेश किया। 1998 में वे पहली बार कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चित्रकूट से विधानसभा चुनाव में उतरे और विधायक चुने गए। तब कांग्रेस पार्टी इस तरह सिमटी हुई नहीं थी, लेकिन दूसरी बार 2003 में और तीसरी बार 2013 में वे चित्रकूट से विधायक चुने गए। तब कांग्रेस का जनाधार कम हो रहा था और भाजपा ने अपने पैर काफी पसार लिए थे। लेकिन प्रेम सिंह की जनप्रियता में कोई कमी नहीं आई। उनके निधन के बाद चित्रकूट सीट पर कांग्रेस को बढ़त मिलना स्वाभाविक ही था। उपचुनाव में हार के बाद भाजपा भी यही कह रही है कि यह तो कांग्रेस की परंपरागत सीट थी। हम जनता के आदेश को स्वीकार करते हैं। हार के पीछे चाहे जो तर्क दिए जाएं, भाजपा के लिए उपचुनाव में यह हार इसलिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य समेत कई वरिष्ठ मंत्री और नेता चित्रकूट में धुआंधार प्रचार करते रहे। शिवराज सिंह चौहान तो पिछले पांच महीनों से मिशन चित्रकूट में लगे थे। उन्होंने यहां 60 से ज्यादा सभाएं कीं, तीन दिन तक डेरा डाल कर रखा, आदिवासी प्रेम दिखाने के लिए ग्राम कुर्रा में एक आदिवासी के घर रात भी बिताई, लेकिन फिर भी जीत का चिराग कांग्रेस की ड्योढ़ी पर ही जला। राम का प्रेम, गरीबों के लिए दर्द, जाति समीकरण की साधना, भाजपा के लिए कोई रणनीति काम नहींआई।

 
 जीएसटी और नोटबंदी के कारण भ्रष्टाचार खत्म होने और विकास के वादे खोखले होने की असलियत चित्रकूट के नतीजों में देखी जा सकती है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार में फसलों के लिए सही दाम मांगते किसानों पर गोलीबारी की गई, नर्मदा बचाने की मुहिम में लगे लोगों का दमन किया गया, व्यापमं घोटाले से किसी न किसी तरह जुड़े लोगों की संदिग्ध मौतेें हुईं, लोककल्याणकारी योजनाएं कागजों से हकीकत में नहीं उतर पाईं, लेकिन दावे ऐसे बड़े-बड़े हुए कि मध्यप्रदेश की सड़केें अमरीका की सड़कों से बेहतर बताई गईं। इन सबका नकारात्मक असर चित्रकूट चुनाव में देखने मिला है। पंजाब में गुरुदासपुर उपचुनाव के बाद कांग्रेस के लिए यह एक और हौसला बढ़ाने वाली जीत है। उत्तरप्रदेश के निकाय चुनाव और गुजरात विधानसभा चुनाव में इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वहां अन्य स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे, लेकिन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के इरादे इससे जरूर बुलंद होंगे। जहां तकसवाल मध्यप्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों का है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि यहां कांग्रेस का 15 सालों का विपक्षवास चित्रकूूट खत्म करवा पाता है या नहींं।
 

Source:Agency

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