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फंसी संपत्तियों पर आयकर का पेच

By Khabarduniya :14-11-2017 06:51


आयकर विभाग का रुख कर्ज में फंसी कंपनियों पर भारी पड़ सकता है। इन कंपनियों पर देश के बैंकों और वित्तीय कंपनियों के भारी कर्ज हैं और वे भुगतान न कर पाने के कारण इस समय राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट में फंसी हुई हैं। अब अगर बैंक इन संपत्तियों को कम कीमत पर बेचते हैं तो आयकर विभाग नए मालिक से इन संपत्तियों की वास्तविक कीमत के आधार पर कर वसूल  सकता है।

बोलीदाताओं, निजी इक्विटी कंपनियों और वकीलों का कहना है कि पुराने बीमार औद्योगिक कंपनी कानून (एसआईसीए) में रुग्ण कंपनियों को आयकर से छूट मिली हुई थी लेकिन नए दिवालिया कानून के तहत इन कंपनियों को कर में कोई छूट नहीं है। इससे संभावित बोलीदाता कर्ज में फंसी इन संपत्तियों का मूल्यांकन कम कर सकते हैं।  एक बोलीदाता ने बताया कि अगर किसी कंपनी पर 50,000 करोड़ रुपये का भारी भरकम कर्ज है और इस ऋण अधिग्रहण करने के लिए कोई 30,000 करोड़ रुपये की बोली लगाता है तो ऋण की बाकी राशि यानी 20,000 करोड़ रुपये कर्जदार कंपनी की आमदनी मानी जाएगी और इसे खरीदने वाले को आयकर या न्यूनतम वैकल्पिक कर देना होगा। 

जेएसडब्ल्यू स्टील के संयुक्त प्रबंध निदेशक शेषगिरि राव ने कहा कि कर्ज में फंसी संपत्ति खरीदने वाले के लिए यह खराब बात होगी और उसे बोली लगाते समय इस खर्च को भी जेहन में रखना होगा। कर्ज के बोझ तले दबी कंपनियों को खरीदने की दौड़ में जेएसडब्ल्यू सबसे आगे है। कंपनी की योजना भूषण स्टील, भूषण पावर ऐंड स्टील, मॉनेट इस्पात और जे पी इन्फ्राटेक को खरीदने की है। इसके लिए वह एऑन कैपिटल और पीरामल-बेन कैपिटल क्रेडिट और जेपी के प्रमोटरों के साथ करार कर रही है। जेएसडब्ल्यू के अलावा आर्सेलर मित्तल, वेदांत, टाटा स्टील और कई प्राइवेट इक्विटी फंड भी कर्जदार इस्पात कंपनियों को हासिल करने की दौड़ में हैं।

पीडब्ल्यूसी इंडिया में वित्तीय सेवा कर के लीडर भविन शाह ने कहा कि आयकर कानून में प्रावधान है कि अगर कोई ऋणदाता अपने कर्ज में कटौती करता है या ब्याज छोड़ देता है तो उसे कर्जदार कंपनी की आय माना जाएगा और उस पर टैक्स लगेगा। इस मसले पर सरकार को स्पष्टीकरण देना चाहिए। दिलचस्प यह है कि दिवालिया कानून की धारा 238 के प्रावधान दूसरे सभी कानूनों पर भारी हैं। मगर इसी कानून में आगे कहा गया है कि उसे मौजूदा नियमों को मानना होगा। एक बोलीदाता ने कहा कि हमें हमारे वकीलों से दो राय मिली हैं। जाहिर है इससे भविष्य में मुकदमेबाजी बढ़ेगी। 

बोलीदाताओं ने कहा कि दिवालिया कानून में यह भी जरूरी है कि अगर कोई बोलीदाता पंचाट में पहुंची किसी कर्जदार कंपनी का अधिग्रहण करता है तो उसे प्रतिस्पस्‍पर्धा आयोग से भी इजाजत लेनी पड़ेगी। सूत्रों के अनुसार प्रतिस्‍पर्धा कानून से जेएसडब्ल्यू स्टील और टाटा स्टील को भी परेशानी हो सकती है। कंपनियां इस मसले को सरकार के समक्ष उठाएंगी। 

Source:Agency

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