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नेहरू, कौन नेहरू, कहां के...

By Khabarduniya :13-11-2017 07:40


पं. नेहरू के अवदान को रेखांकित करना ही होगा। आर्थिक क्षेत्र में 'आत्मनिर्भरता' की अवधारणा उनकी ही है। तीसरी दुनिया को एक छाते के नीचे लाकर साम्राज्यवाद व उसके मंसूबों के खिलाफ जबरदस्त मोर्चा बनाया- वे गुटनिरपेक्षता के प्रणेता थे और आज भी विश्व उनके इस अवदान को याद करता है- शीतयुद्ध काल में स्वतंत्र देशों में एक राजनीतिक व नैतिक तथा लोकतांत्रिक साहस का संचार करने उन्होंने अथक प्रयास किया। पं. नेहरू को न मानो, यह आप कर सकते हैं लेकिन पं. नेहरू को विलन न बनाओ उनकी चरित्र हत्या करने अफवाहें न फैलाई जाए।

अक्टूबर में महात्मा गांधी की जयंती, सरदार पटेल की जयंती, श्रीमती इंदिरा गांधी शहादत दिवस पड़ते हैं तथा नवम्बर माह में पं. नेहरू व इंदिरा गांधी का जन्मदिन पड़ता है। 14 नवम्बर को पं. नेहरू का जन्मदिन है और 19 नवम्बर को श्रीमती इंदिरा गांधी का। पिछले तीन वर्षों से सत्ता की राजनीति के शीर्ष पर बैठे तथा पक्षपाती मीडिया द्वारा इन महापुरुष पर चर्चा का नया ट्रेड चलाया गया है। इस साल तो कुछ न्यूट चैनल्स ने तो कमाल ही कर दिया- यह चर्चा छेड़ दी कि सरदार पटेल बड़े नेता कि श्रीमती इंदिरा गांधी। बहरहाल इन तीन सालों में मीडिया के माध्यम से सत्ता चाहती है कि पं. नेहरू को इतिहास से विलोपित कर दिया जाए। चर्चा कुछ इन रूपों में की जाने लगी है- नेहरू ने सरदार पटेल को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया- वर्किंग कमेटी में सरदार पटेल को बहुमत का समर्थन था। बहरहाल राजनीतिक संगठन में हर निर्णय जरूरत के अनुसार लिए जाते हैं उस समय प्रधानमंत्री पद का निर्णय भी राजनीतिक जरूरत के अनुसार लिया गया। भाजपा में भी यही होता रहा है और हर पोलिटिकल पार्टी में ऐसा ही होता है। जनसंघ के समय बलराज मधोक जी अध्यक्ष पद से क्यों और किस तरह हटा दिए गए... मधोकजी जीवनपर्यन्त जनसंघ का दिया जलाए रहे।

2014 में आडवानी जी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाए गए, जबकि उनका हक बनता था। लेकिन राजनीतिक जरूरत अलग मांग कर रही थी अत: आडवानी जी को किनारा कर श्री मोदीजी को प्रधानमंत्री बनाया गया- इस विषय पर मीडिया चर्चा क्यों नहीं करता कि आडवानी जी को क्यों और किसने बनने नहीं दिया। आडवानी जी के रूठने, त्यागपत्र देने आदि की परवाह नहीं की गई और भाजपा के एक वर्ग की नाराजगी की भी परवाह नहीं की गई- सारे वरिष्ठ किनारे कर दिए गए। देश में भी भाजपा के लोग व समर्थक आडवानी जी के 'रूठने' से नाराज हो उठे थे। मतलब राजनीति अपने ढंग से काम करती है। बहुत से लोग चाहते थे कि आडवानीजी प्रधानमंत्री बनाए जाएं। नहीं बनाया पार्टी ने। मीडिया इस प्रकरण पर मौन है। नेहरू और पटेल के माध्यम से भाजपा और उसका समर्पित मीडिया नेहरू को एकदम स्वार्थी, आत्मकेंद्रित व पटेल विरोधी सिद्ध करने में लगा है। राजनीतिक मजबूरी के कारण ही एक समय वी.पी. सिंह सरकार को एक तरफ भाजपा व दूसरी तरफ से वामदल समर्थन दे रहे थे।

ज्योति बसु को सीपीएम ने प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया- राजनीति की जरूरत के कारण। कांग्रेस पार्टी के त्रिपुरी अधिवेशन में सीताभिपट्टारमैया और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के बीच अध्यक्ष पद के लिए टक्कर हो गई। महात्मा गांधी ने कहा- सीतारमैया की हार मेरी हार है- सुभाषचंद्र बोस जीत गए- लेकिन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस हमेशा गांधी जी का सम्मान करते रहे। यह राजनीतिक जरूरत का संघर्ष था। न गांधीजी के मन में मलाल आया न सुभाषचन्द्र बोस के मन में।  राजनीति अपनी जरूरत से चलती है। लेकिन भाजपा सरकार ने गांधी जी को स्वच्छता अभियान में केंद्रित कर दिया है। उनके महान अवदान को याद नहीं कर रही, न जनता के बीच ला रही। पं. नेहरू तो भाजपा व उसके विचारों के एकदम विपरीत स्थान पर खड़े हैं अत: भाजपा पं. नेहरू के अवदान को किसी रूप में भी याद करेगी इसकी उम्मीद ही नहीं की जानी चाहिए।  

नेहरू-इंदिरा के अवदान को क्या एकदम खारिज कर दिया जाएगा। वर्तमान सत्ता का कुछ ऐसा ही इरादा लगता है। दुख की बात यह है कि गांधी के सत्य, अहिंसा के संदेश तक को याद नहीं की जा रही। इससे भी ज्यादा दुखद यह कि कुछ तत्व खुलेरूप से यह कहने लगे हैं कि गांधी का वध देशहित में था। हिंसा की पैरवी करना तथा उसे उचित बताना घोर दुखदायी है। लोकतंत्र में किसी भी तरह की हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है- लोकतंत्र केवल शासन का एक तरीका ही नहीं है, यह एक तरह से संस्कृति है और लोकतंत्र व्यवस्था को अपनाना मतलब हिंसा को त्यागना और बातचीत का रास्ता अख्तियार करना होता है। लेकिन हो उल्टा रहा है- सत्ता पाने के लिए लोकतंत्र में भी सामंती घोड़े पर चढ़कर जाया जा रहा है। विचार व कर्म सामंती लेकिन मजबूरी में लोकतंत्र को अपना रहे, यह छल है। इससे हमारा लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। सत्ता में आते ही सामंती ठसन साफ झलकने लगती है।

सरदार पटेल देश के मान्य नेता हैं- उनके अवदान को कोई भी कम करके नहीं आंकता। लेकिन भाजपा वर्तमान सत्ता यह प्रचारित करने में लगी है कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की उपेक्षा की गई। यह गलत है। खैर- जरा इस पर भी विचार करें कि सरदार पटेल ने देश की रियासतों को भारत संघ में मिलाने का महान कार्य किया। सब मानते हैं। लेकिन यह सामूहिक जवाबदारी के तहत हुआ- सरकार की नीति को अमलीजामा पहनाने में सरदार पटेल ने अहम भूमिका निभाई। यह कहा जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि सरदार पटेल ने किसान आंदोलन का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया वे महान किसान नेता भी थे- इसे रेखांकित नहीं किया जाता। किसानों ने ही उन्हें मुखिया माना और यह उपाधि की तरह उनके साथ रहा- सरदार पटेल मतलब नेतृत्व देने वाले महान नेता। 1946 में सरदार पटेल ने ही कांग्रेस में इंटुक (मजदूर संगठन) इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की पहल की और स्थापित किया। कांग्रेस का यह मजदूर विंग है- उनके इस अवदान को भी याद किया जाना चाहिए। अच्छे प्रशासन और संवेदनशील नेता के रूप में भी उनकी पहचान है।

 
राजनीतिक संगठन तथा सत्ता में राजनीतिक, नीतिगत तथा क्रियान्वयन संबंधी मतभेद नेतृत्व वर्ग में होते रहते हैं- जो बड़े नेता होते हैं उनमें नीतियों व क्रियान्वयन को लेकर मतभेद पैदा हो जाते हैं-यह स्वाभाविक है, हर पार्टी में ऐसा होता है। लेकिन इसे ही विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाकर घिसल पट्टी  की जाती रहे, यह तो किसी खास एजेंडा का हिस्सा हुआ- किस पोलिटिक या सामाजिक संगठन में आपसी मतभेद नहीं होते, या नहीं है, सब में है। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक भी है। मतभेद को ही विमर्श का मूल पार्ट बना दिया जाए यह उचित नहीं इस तरह करने पर लगता है कि यह कब खास एजेंटा के तहत किया जा रहा है। पं. नेहरू केवल 'भारत के प्रथम प्रधानमंत्री' के रूप में ही याद करने के लिए नहीं है, उन्होंने नींव रखी है। विकास का अपना मॉडल पेश किया है- लोकतांत्रिकता को मजबूत करने का काम किया है और वैज्ञानिक दृष्टि विकसित करने का सतत प्रयास किया है।

वर्तमान सत्ता पं. नेहरू से अलग राय, विचार, नीतियां रख सकती है, समय के साथ अवधारणाएं बदलती रहती हैं लेकिन हमारे पूर्वजों के अवधारणा को खारिज कर खुद को ही स्थापित करते चलने का परिणाम स्वादिष्ट नहीं हो सकती। पं. नेहरू के अवदान को रेखांकित करना ही होगा। आर्थिक क्षेत्र में 'आत्मनिर्भरता' की अवधारणा उनकी ही है। तीसरी दुनिया को एक छाते के नीचे लाकर साम्राज्यवाद व उसके मंसूबों के खिलाफ जबरदस्त मोर्चा बनाया- वे गुटनिरपेक्षता के प्रणेता थे और आज भी विश्व उनके इस अवदान को याद करता है- शीतयुद्ध काल में स्वतंत्र देशों में एक राजनीतिक व नैतिक तथा लोकतांत्रिक साहस का संचार करने उन्होंने अथक प्रयास किया। पं. नेहरू को न मानो, यह आप कर सकते हैं लेकिन पं. नेहरू को विलन न बनाओ उनकी चरित्र हत्या करने अफवाहें न फैलाई जाए।

प्रधानमंत्री मोदी जी ने सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर कहा कि सरदार पटेल की उपेक्षा की गई और कहा कि पिछली सरकारों ने सरदार पटेल के अवदान की जानबूझ कर उपेक्षा की। कहा जाता है कि उन्हें युवा पीढ़ी की जानकारी तक जानबूझ कर आने नहीं दिया गया। पता नहीं ऐसा क्यों कह दिया जाता है। युवा पीढ़ी अपने से पूर्व की पीढ़ी को जिन माध्यमों से जानती है, जानकारी प्राप्त करती है, वह सब तो किया गया। कुछ उदाहरण रखे जा सकते हैं- म.प्र. का शासन जिस भवन से चलता है (मंत्रालय) उस भवन का नाम है वल्लभ भवन। गुजरात विधानसभा का नाम सरदार पटेल विधानसभा भवन है। देश के बड़े पुलिस अफसर जहां ट्रेनिंग लेते हैं- हैदराबाद स्थित उस अकादमी का नाम सरदार पटेल के नाम पर है। सूरत की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी का नाम भी सरदार पटेल के नाम पर है। गुजरात में सरदार पटेल के नाम पर विश्वविद्यालय है। बीकानेर में सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज है।

दिल्ली में एक मेट्रो स्टेशन इनके नाम पर है। देशभर में सरदार पटेल के नाम पर विद्यालय, महाविद्यालय, सड़कें, पार्क, स्टेडियम, एयरपोर्ट हैं। सरदार सरोवर है। आज देश एकजुट है तो इसका श्रेय प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल को जाता है। यह सही है। लेकिन सरदार पटेल के अन्य योगदान को स्वतंत्रता आंदोलन में उनके जूझने को, किसान आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करने, मजदूर संगठन बनाने को याद नहीं करते। लगता है ये लोग सरदार पटेल की जयंती के बहाने प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू के अवदान को खारिज करना व पं. नेहरू को इतिहास से बाहर करने के उद्देश्य से सब कर रहे हंै। वे सरदार पटेल को याद नहीं करते, वे तो पं. नेहरू को भुला देने व रिजेक्ट करने की भूमिका बना रहे।
 

Source:Agency

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