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आखिर ऐसी स्थिति आई क्यों?

By Khabarduniya :11-11-2017 08:18


साल दर साल जमा हो रहे प्रदूषण से मुक्ति पानी है तो वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण की हमें चिंता करनी होगी और यह सिर्फ जाड़ों के महीनों में नहीं, बल्कि साल भी करनी होगी। वाहनों की संख्या सड़कों पर से यथासंभव घटानी होगी। उनमें इस्तेमाल किए जा रहे ईंधन को भी पर्यावरण के अनुकूल रखना होगा। लेकिन हम बिल्कुल उलटा कर रहे हैं। विकास के नाम पर गाड़ियों की संख्या बढ़़ाई जा रही है और उन्हें दौड़ने के लिए सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है और असंख्य फ्लाईओवर बनाए जा रहे हैं। यानी विकास के द्वारा दिल्ली के प्रदूषित करने का पूरा इंतजाम किया जा रहा है।

दिल्ली सहित पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण ने मारक रूप अख्तियार कर लिया है और सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक इस समस्या को हल करने के लिए अपने-अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रहा है। तरह-तरह की तरकीबें सुझाई जा रही हैं और यह स्थिति पैदा होने के लिए तरह-तरह के कारण बताए जा रहे हैं। दिल्ली सरकार 5 दिनों के लिए ऑड इवन फॉर्मूले के तहत चौपहिया निजी वाहन चलवाएगी। निर्माण कार्यों पर रोक लगाने के आदेश जारी कर दिए हैं, जिन पर पूरी तरह से अमल ही नहीं होना है। कचरों को जलाए जाने पर भी रोक है, लेकिन इस पर भी अमल नहीं होने वाला है। यह तरकीब दिल्ली को राहत नहीं दिलाने वाले हैं। इसका कारण यह है कि यह समस्या कोई एक या दो महीने के कारण पैदा नहीं हुई है। यह दशकों की गलत नीतियां और योजनाओं का परिणाम है। आप ऑड-इवन फार्मूले से आधे निजी चौपहिया वाहनों को सड़क से दूर रखेंगे, लेकिन आसमान के ऊपर से जो प्रदूषण उतर रहा है, उसका क्या होगा। दिल्ली के प्रदूषण के लिए ये वाहन निश्चय रूप से जिम्मेदार हैं, लेकिन उन्होंने यह प्रदूषण किसी एक दिन में तैयार नहीं किया है।

प्रदूषण मिटाने के लिए सुझाए जा रहे फौरी तरकीब इसलिए भी नाकाम होंगे, क्योंकि प्रदूषण के सही कारणों पर लोगों की नजर ही नहीं जा रही है। कहा जा रहा है कि पंजाब और हरियाणा में खेतों की खूंटी को जलाने के कारण दिल्ली प्रदूषित हो गई है। दिल्ली के प्रदूषण में उसका थोड़ा योगदान हो सकता है, लेकिन खूंटी जलाना मुख्य रूप से जिम्मेदार नहीं हो सकता, क्योंकि यदि दिल्ली उसके प्रदूषण की गिरफ्त में है, तो वे क्षेत्र तो और भी प्रदूषित होने चाहिए, जहां खेतों की खूंटियां जलाई जा रही हैं। पर वैसा तो है नहीं।

कभी हम दिल्ली के प्रदूषण के लिए पश्चिम से आने वाली धूल और धुएं भरी हवा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो कभी पूरब से आने वाली नमी भरी हवा को और कभी-कभी कह रहे हैं कि पश्चिम से धुएं भरी हवा पूरब से आने वाली नमी भरी हवा से मिलकर दिल्ली की हवा को गंदी कर रही है। यानी दिल्ली को हम दो दिशाओं से दो गुणों वाली हवा का संगम स्थल बता कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो रहे हैं। इस तरह की दिमागी कसरत से दिल्ली की हवा साफ होने वाली नहीं है। जो कारण हैं, उन्हें हमें ईमानदारी से समझना और मानना होगा। 

दरअसल दिल्ली विकास का शिकार हो गई है। इसके विकास के लिए जो योजनाएं और परियोजनाएं बनाईं गईं, वे दोषपूर्ण रही हैं और उसका खामियाजा ही दिल्ली भुगत रही है। यहां के प्रदूषण की समस्या को समझने के लिए वाहन द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण और दिल्ली के विकास की परियोजना की खामियों को समझना होगा। इन दोनों के कारण ही आज दिल्ली की यह स्थिति बनी हुई है। सबसे पहले वाहनों पर विचार करें।

 
साल भर यहां गाड़ियां चलती हैं और उनका धुंआ ऊपर उठकर आसमान में जाता रहता है। धीरे-धीरे वह बहुत ऊंचाई प्राप्त कर लेता है। बरसात में कुछ प्रदूषण पानी के साथ नीचे आता है, लेकिन बादलों से ऊपर पहुंचे प्रदूषण ऊपर ही रह जाते हैं। फिर ठंड का मौसम शुरू होते ही वह प्रदूषण नीचे उतरने लगता है। कम तापमान के कारण प्रदूषण के कण आपस में मिलकर सघन होने लगते हैं और नीचे आने लगते हैं। सर्दी के मौसम में पृथ्वी की गर्मी उन्हें ऊपर की ओर धकेले नहीं रख पाती और वे नीचे आकर हवा को प्रदूषित कर देते हैं। प्रदूषण के वे कण सालों भर चौबीसों घंटे निकलते रहते हैं, इधर-उधर फैलते रहते हैं और ऊपर भी उठते रहते हैं। जाड़े के मौसम में ऊपर गए कण वापस पृथ्वी पर आ जाते हैं। प्रदूषण के सबसे बड़े कारण वे ही हैं, न कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जलाई जाने वाली खूंटी या पराली।

इसलिए साल दर साल जमा हो रहे प्रदूषण से मुक्ति पानी है तो वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण की हमें चिंता करनी होगी और यह सिर्फ जाड़ों के महीनों में नहीं, बल्कि साल भी करनी होगी। वाहनों की संख्या सड़कों पर से यथासंभव घटानी होगी। उनमें इस्तेमाल किए जा रहे ईंधन को भी पर्यावरण के अनुकूल रखना होगा। लेकिन हम बिल्कुल उलटा कर रहे हैं। विकास के नाम पर गाड़ियों की संख्या बढ़़ाई जा रही है और उन्हें दौड़ने के लिए सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है और असंख्य फ्लाईओवर बनाए जा रहे हैं। यानी विकास के द्वारा दिल्ली के प्रदूषित करने का पूरा इंतजाम किया जा रहा है।

वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के अलावा और उससे भी बड़ा जिम्मेदार दिल्ली के इर्दगिर्द किए गए विकास की परियोजनाएं हैं। पूरे हिंदी क्षेत्र में दिल्ली ही एक मात्र विकास केन्द्र है। हिन्दी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों से भारी संख्या में यहां लोग आते हैं, क्योंकि विकास केन्द्र होने के कारण यह रोजगार प्रदान करने वाला केन्द्र भी है। पिछले कुछ दशकों में हमने दिल्ली इर्दगिर्द राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकास का मॉडल तैयार कर लिया है। इसके कारण दिल्ली पर दबाव और भी बढ़ गया है। यह विकास दिल्ली पर से दबाव घटाने के नाम पर किया गया, लेकिन विकास केन्द्र के कारण अन्य स्थानों के लोग भी यहां आ गए और उससे दिल्ली पर बोझ और भी बढ़ गया।

जबकि होना यह चाहिए था कि दिल्ली से दूर अन्य विकास केन्द्रों को विकसित किया जाना चाहिए था, जिससे लोग वहां जाते और दिल्ली के आसपास लोगों का जमावड़ा नहीं लगता। पर सरकार द्वारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नाम पर पड़ोसी, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के क्षेत्र को भी दिल्ली के विस्तार के रूप में विकसित किया गया और उस पर सरकार और निजी क्षेत्र के लाखों करोड़ रुपये खर्च किए गए। विकास तो हो गया, जो दिखाई भी देता है, लेकिन अदृश्य रूप से विनाश के बीज का भी वपन होता रहा। आज दिल्ली में पैदा हुए वायु प्रदूषण को हवा में डिफ्यूज होने के लिए जगह भी नहीं है, क्योंकि इसके इर्दगिर्द राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को प्रदूषित वायु है। और हम गंदी हवा में सांस लेने को अभिशप्त हैं। 
 

Source:Agency

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