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Date 18-10-17

साम्प्रदायिक घृणा को यहां तक ले आये!

By Khabarduniya :10-10-2017 08:13


अभी यह खुलासा होना बाकी है कि गोहत्या की इस साजिश के लिए उन्हें किसने प्रेरित किया और क्यों उन्हें समकालीन हिंदू समाज व्यवस्था के शीर्ष पर बैठी जाति से होने के बावजूद इस धतकरम से अपना इहलोक-परलोक बिगड़ने के डर ने नहीं सताया? बहरहाल, अवध में इस सिलसिले में एक पुरानी कहावत चली आती है। यह कि एक बार कुछ दलितों ने एक गधे को मार दिया तो इसकी एवज में उन्हें भारी भरकम सामाजिक व आर्थिक दंड सुनाया गया। लेकिन निर्णायकों को बताया गया कि गधे को मारने वाले दलितों के साथ उनमें से एक का बेटा संतोष भी था, तो उन्होंने इंसाफ की कसौटी बदल दी। कह दिया-जहां रहैं पूत संतोष, उहां गदहा मारे केस दोख?

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने 'देश की अर्थव्यवस्था को गर्त में धकेलने' को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार को कोसना शुरू किया तो सिर्फ यही नहीं हुआ कि उन्हें जवाब देने के लिए यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा को, जो मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य होने के कारण उसके सामूहिक उत्तरदायित्व से बंधे हुए है, गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी आगे कर दिया गया या मुद्दे को भटकाने के लिए महाभारत के शल्य व भीष्म जैसे पात्रों के बीच ले जाया गया। अब यह तर्क भी सामने लाया जा रहा है कि मोदीराज में अर्थव्यवस्था का हाल कितना भी खराब हो, उतना खस्ता नहीं है, जितना उसे यशवंत सिन्हा 1991 में चन्द्रशेखर सरकार के वित्तमंत्री के रूप में कर गये थे। तब तो देश को अपना सोना तक गिरवी रखना पड़ा था।    

कुछ हद तक यह तर्क सही हो सकता है, क्योंकि 1991 के बाद से देश की नदियों में भूमंडलीकरण की नीतियों का जो ढेर सारा पानी बह चुका है, उनके कारण एक छोटे तबके को ही सही, अकूत श्री और समृद्धि हथियाने के एक से बढ़कर एक 'सुअवसर' हासिल हुए हंै और उनकी चमक से देश के कई शहरों में खासी रौनक दिखाई देती है। लेकिन इस बात का क्या किया जाये कि इस सरकार के चलते देश के सामाजिक व सांस्कृतिक हालात इतने बदतर हो गये हैं कि कदम-कदम पर 1991 खड़ा दिखाई देता है। 

उन दिनों अयोध्या विवाद के बहाने भाजपा व विश्व हिन्दू परिषद मिलकर साम्प्रदायिक उन्माद का जो सैलाब ले आईं, भोले-भाले धार्मिक लोगों को जिसमें ऊभ-चूभ करके फूली-फूली फिरती हुई वे उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह व देश में अटलबिहारी वाजपेयी प्रवर्तित  'अपनीÓ सरकारों का सपना साकार करने में सफल हुईं और उनके राजनीतिक विरोधियों ने इन सरकारों की बेदखली के साथ ही जिसे 'उतार पर पहुंच गयाÓ मान लेने की गलती की, देश में नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकारें बनने के बाद उसका पानी न सिर्फ देश के रंध्र-रंध्र से रिसने लगा है बल्कि सैलाब उतरने के बाद उससे पीड़ित क्षेत्रों में फैलने वाली नाना प्रकार की बीमारियों की तरह कुछ ठिकाना ही नहीं रह गया है कि वह कब कहां से किस रूप में फूट पड़े!

 
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में कटरा बाजार के पास स्थित भटपुरवा गांव में गत दिनों दशहरा व गांधी जयंती के अवसर पर तो वह ऐसे रूप में फूटा, जिसकी इससे पहले कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था। दरअसल, गंगा-जमुनी संस्कृति वाले अवध के अनेक अन्य गांवों की तरह भटपुरवा में ब्राह्मणों की बसाहट के आस-पास अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी आबादी है। उन सब में भरपूर सौमनस्य है और अयोध्या में विवादित रामजन्मभूमि बावरी मस्जिद की जगह से कुछ ही किलोमीटर दूर होने के बावजूद उनके बीच आमतौर पर साम्प्रदायिक उद्वेलनों या उपद्रवों का कोई इतिहास नहीं है। भले ही गोंडा आ•ाादी के पहले से ही साम्प्रदायिक शक्तियों की सक्रियता का केन्द्र रहा हो और अयोध्या विवाद में अपने पति के केके नैयर द्वारा निभाई गई भूमिका के 'पुण्य-प्रतापÓ से उनकी पत्नी शकुन्तला नैयर ने पहले ही आम चुनाव में गोंडा लोकसभा सीट जीत ली हो। गोंडा जिले के कर्नलगंज कस्बे में सितम्बर 1990 में हुए दंगे में सैकड़ों लोग मारे गए थे, तो भी साम्प्रदायिक सद्भाव में यहां के लोगों का विश्वास निष्कंप बना रहा था। 

लेकिन प्रदेश में आक्रामक हिन्दुत्व के पैरोकार योगी आदित्यनाथ की सरकार क्या बनी, कुछ लोग इस इतिहास को बदले बगैर चैन नहीं पा रहे। इन बेचैन लोगों ने ऐन दशहरे पर भटपुरवा गांव निवासी गणेशप्रसाद दीक्षित की बछिया उनके ही दो ब्राह्मण पड़ोसियों रामसेवक व मंगल के हाथों 'खुलवा' दी। बाद में इस बछिया का धड़ से अलग किया हुआ सिर बरामद हुआ और जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, इसकी तोहमत अल्पसंख्यकों पर मढ़ी जाने लगी। फिर तो साम्प्रदायिक तनाव के चलते स्थिति इतनी खराब हो गई कि वहां बड़ी संख्या में पुलिस व पीएसी तैनात करनी पड़ी। वह तो भला हो, कुछ भले ग्रामीणों का, जिन्होंने बछिया की हत्या के बाद रामसेवक व मंगल को भागते हुए देखा था और गांव के अमन चैन पर बन आई तो मुंह बंद रखने के लिए धमकाये जाने पर भी जिन्हें चुप मंजूर नहीं हुआ।  उन्होंने इस बाबत पुलिस को बताया तो साजिश का भांडा फूटते देर नहीं लगी। रामसेवक व मंगल को गिरफ्तार किया गया तो वे नशा किये हुए थे। पुलिस ने उनका आपराधिक इतिहास खंगाला तो पाया कि उनके खिलाफ पहले से ही कई मुकदमे चल रहे हैं और दोनों उनमें जेल भी जा चुके हैं।' 

अभी यह खुलासा होना बाकी है कि गोहत्या की इस साजिश के लिए उन्हें किसने प्रेरित किया और क्यों उन्हें समकालीन हिंदू समाज व्यवस्था के शीर्ष पर बैठी जाति से होने के बावजूद इस धतकरम से अपना इहलोक-परलोक बिगड़ने के डर ने नहीं सताया? बहरहाल, अवध में इस सिलसिले में एक पुरानी कहावत चली आती है। यह कि एक बार कुछ दलितों ने एक गधे को मार दिया तो इसकी एवज में उन्हें भारी भरकम सामाजिक व आर्थिक दंड सुनाया गया। लेकिन निर्णायकों को बताया गया कि गधे को मारने वाले दलितों के साथ उनमें से एक का बेटा संतोष भी था, तो उन्होंने इंसाफ की कसौटी बदल दी। कह दिया-जहां रहैं पूत संतोष, उहां गदहा मारे केस दोख? 

ऐसे में अगर उनके इस धतकरम का अर्थ यह है कि प्रदेश की योगी सरकार में उनकी स्थिति 'पूत संतोष' जैसी है और वे कुछ भी करें, उनका बाल तक बांका नहीं होने वाला, तो इसके खतरों को समय रहते महसूस किया जाना चाहिए। रामसेवक व मंगल दोनों ने पुलिस को साफ-साफ बताया है कि वे यह बात फैलाना चाहते थे कि मुसलमानों के कारण गांव में 'ब्राह्मण की गाय' तक सुरक्षित नहीं है, ताकि मुसलमानों को 'मजा' चखा सकें। प्रेक्षकों के निकट इसका एक अर्थ यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तथाकथित गोरक्षकों को दी जा रही बार-बार की चेतावनियों का उलटा असर हो रहा है और अब बात उनके द्वारा साजिश रचकर खुद गोहत्याएं कर अल्पसंख्यकों को फंसाने तक जा पहुंची है। इस स्थिति की योगी और मोदी में से किसी एक को तो जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए, लेकिन अभी तो हालत यह है कि पुलिस कह रही है कि उस पर इन दोनों के खिलाफ गोवध निषेध कानून की धाराएं न लगाने का बड़ा दबाव है और योगी सरकार अयोध्या में भव्य सरकारी दीपावली की तैयारियां कर रही है। उसकी नीयत इसी से समझी जा सकती है कि ये हालात उसे दीपावली मनाने लायक लगते हैं।  

1990-92 में साम्प्रदायिक उन्माद के बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक जा पहुंचने के बाद देश के अनेक शहरों में उपद्रवों के बाद एक साथ कर्फ्यू लगाने की नौबत आई थी। लेकिन तब गांव, कुछ अपवादों को छोड़कर, उसके जहर से बचे रहे थे। ग्रामीणों के सौमनस्य के कारण वहां सौहार्द्र बरकरार रहा था। लेकिन भटपुरवा की घटना चेतावनी है कि रोज-रोज फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक तनावों के अजगर इस बार ग्रामीण भारत को भी निगलने पर आमादा हैं और सत्तापोषित साम्प्रदायिक तत्व अपनी दूषित चेतनाओं का ग्राम्यीकरण करने में कुछ भी उठा नहीं रख रहे। प्रसंगवश, आदर्शों और सपनों से भरी आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी प्राय: कहा करते थे कि आजादी मिल जाएगी तो शहरों में दंगे होना बंद हो जाएंगे और गांवों में तो वे बिल्कुल नहीं होंगे। हमें अपने नये सत्ताधीशों से पूछना चाहिए कि वे महात्मा गांधी को अपने स्वच्छता अभियानों तक सीमित रखकर उनकी इस हार्दिक मंशा के खिलाफ काम करने वालों के प्रति इतने सहिष्णु क्यों हैं? अपने खिलाफ लग रहे असहिष्णुता के पोषण के आरोपों को गलत सिद्ध करने के लिए? 
 

Source:Agency

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